श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 8: गर्भोदकशायी विष्णु से ब्रह्मा का प्राकट्य  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक
उदाप्लुतं विश्वमिदं तदासीद्
यन्निद्रयामीलितद‍ृङ् न्यमीलयत् ।
अहीन्द्रतल्पेऽधिशयान एक:
कृतक्षण: स्वात्मरतौ निरीह: ॥ १० ॥
 
शब्दार्थ
उद—जल में; आप्लुतम्—डूबे, निमग्न; विश्वम्—तीनों जगतों को; इदम्—इस; तदा—उस समय; आसीत्—यह इसी तरह था; यत्—जिसमें; निद्रया—नींद में; अमीलित—बन्द की; दृक्—आँखें; न्यमीलयत्—पूरी तरह से बन्द नहीं; अहि-इन्द्र—महान् सर्प अनन्त; तल्पे—शय्या में; अधिशयान:—लेटे हुए; एक:—एकाकी; कृत-क्षण:—व्यस्त; स्व-आत्म-रतौ—अपनी अन्तरंगा शक्ति का आनन्द लेते; निरीह:—बहिरंगा शक्ति के किसी अंश के बिना ।.
 
अनुवाद
 
 उस समय जब तीनों जगत जल में निमग्न थे तो गर्भोदकशायी विष्णु महान् सर्प अनन्त की अपनी शय्या में अकेले लेटे थे। यद्यपि वे अपनी निजी अन्तरंगा शक्ति में सोये हुए लग रहे थे और बहिरंगा शक्ति के प्रभाव से मुक्त थे, किन्तु उनकी आँखें पूर्णतया बन्द नहीं थीं।
 
तात्पर्य
 भगवान् अपनी अन्तरंगा शक्ति द्वारा सतत दिव्य आनन्द लेते हैं, जबकि बहिरंगा शक्ति विराट जगत के प्रलय के समय निलम्बित कर दी जाती है।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥