श्रीमद् भागवतम
 
हिंदी में पढ़े और सुनें
भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 8: गर्भोदकशायी विष्णु से ब्रह्मा का प्राकट्य  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  3.8.11 
सोऽन्त:शरीरेऽर्पितभूतसूक्ष्म:
कालात्मिकां शक्तिमुदीरयाण: ।
उवास तस्मिन् सलिले पदे स्वे
यथानलो दारुणि रुद्धवीर्य: ॥ ११ ॥
 
शब्दार्थ
स:—भगवान्; अन्त:—भीतर; शरीरे—दिव्य शरीर में; अर्पित—रखा हुआ; भूत—भौतिक तत्त्व; सूक्ष्म:—सूक्ष्म; काल- आत्मिकाम्—काल का स्वरूप; शक्तिम्—शक्ति; उदीरयाण:—अर्जित करते हुए; उवास—निवास किया; तस्मिन्—उस में; सलिले—जल में; पदे—स्थान में; स्वे—निजी; यथा—जिस तरह; अनल:—अग्नि; दारुणि—लकड़ी में; रुद्ध-वीर्य:—लीन शक्ति ।.
 
अनुवाद
 
 जिस तरह ईंधन के भीतर अग्नि की शक्ति छिपी रहती है उसी तरह भगवान् समस्त जीवों को उनके सूक्ष्म शरीरों में लीन करते हुए प्रलय के जल के भीतर पड़े रहे। वे काल नामक स्वत: अर्जित शक्ति में लेटे हुए थे।
 
तात्पर्य
 जब तीनों लोक—ऊर्ध्व, मध्य तथा अधोलोक—प्रलय के जल में निमग्न हो गये तो तीनों लोकों के जीव काल नामक शक्ति के द्वारा अपने सूक्ष्म शरीरों में पड़े रहे। इस प्रलय में स्थूल शरीर अप्रकट हो गये, किन्तु सूक्ष्म शरीर स्थित रहे जिस तरह भौतिक सृष्टि का जल पड़ा रहता है। इस तरह भौतिक शक्ति पूर्णतया नि:शेष नहीं हुई जैसाकि भौतिक जगत के पूर्ण प्रलय में होता है।
 
शेयर करें
       
 
  All glories to Srila Prabhupada. All glories to वैष्णव भक्त-वृंद
  Disclaimer: copyrights reserved to BBT India and BBT Intl.

 
About Us | Terms & Conditions
Privacy Policy | Refund Policy
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥