श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 8: गर्भोदकशायी विष्णु से ब्रह्मा का प्राकट्य  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक
तस्यार्थसूक्ष्माभिनिविष्टद‍ृष्टे-
रन्तर्गतोऽर्थो रजसा तनीयान् ।
गुणेन कालानुगतेन विद्ध:
सूष्यंस्तदाभिद्यत नाभिदेशात् ॥ १३ ॥
 
शब्दार्थ
तस्य—उसका; अर्थ—विषय; सूक्ष्म—सूक्ष्म; अभिनिविष्ट-दृष्टे:—जिसका ध्यान स्थिर किया गया था, उसका; अन्त:-गत:— आन्तरिक; अर्थ:—प्रयोजन; रजसा—रजोगुण से; तनीयान्—अत्यन्त सूक्ष्म; गुणेन—गुणों के द्वारा; काल-अनुगतेन— कालक्रम में; विद्ध:—क्षुब्ध किया गया; सूष्यन्—उत्पन्न करते हुए; तदा—तब; अभिद्यत—वेध दिया; नाभि-देशात्—उदर से ।.
 
अनुवाद
 
 सृष्टि का सूक्ष्म विषय-तत्व, जिस पर भगवान् का ध्यान टिका था, भौतिक रजोगुण द्वारा विक्षुब्ध हुआ। इस तरह से सृष्टि का सूक्ष्म रूप उनके उदर (नाभि) से बाहर निकल आया।
 
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥