श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 8: गर्भोदकशायी विष्णु से ब्रह्मा का प्राकट्य  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक
तल्लोकपद्मं स उ एव विष्णु:
प्रावीविशत्सर्वगुणावभासम् ।
तस्मिन् स्वयं वेदमयो विधाता
स्वयम्भुवं यं स्म वदन्ति सोऽभूत् ॥ १५ ॥
 
शब्दार्थ
तत्—उस; लोक—ब्रह्माण्ड के; पद्मम्—कमल को; स:—वह; उ—निश्चय ही; एव—वस्तुत:; विष्णु:—भगवान्; प्रावीविशत्—भीतर घुसा; सर्व—समस्त; गुण-अवभासम्—समस्त गुणों का आगार; तस्मिन्—जिसमें; स्वयम्—खुद; वेद- मय:—साक्षात् वैदिक; विधाता—ब्रह्माण्ड का नियंत्रक; स्वयम्-भुवम्—स्वत: उत्पन्न; यम्—जिसको; स्म—भूतकाल में; वदन्ति—कहते हैं; स:—वह; अभूत्—उत्पन्न हुआ ।.
 
अनुवाद
 
 उस ब्रह्माण्डमय कमल पुष्प के भीतर भगवान् विष्णु परमात्मा रूप में स्वयं प्रविष्ट हो गये और जब यह इस तरह भौतिक प्रकृति के समस्त गुणों से गर्भित हो गया तो साक्षात् वैदिक ज्ञान उत्पन्न हुआ जिसे हम स्वयंभुव (ब्रह्मा) कहते हैं।
 
तात्पर्य
 यह कमल का फूल भौतिक जगत में ब्रह्माण्ड का विराट रूप है। प्रलय के समय यह भगवान् विष्णु के उदर में घुलमिल जाता है और सृष्टि के समय प्रकट होता है। यह गर्भोदकशायी विष्णु के कारण है, जो प्रत्येक ब्रह्माण्ड में प्रवेश करते हैं। इस रूप में भौतिक प्रकृति द्वारा बद्ध समस्त जीवों के सकाम कर्मों का सार-समाहार रहता है और इस कमल पुष्पा से सर्वप्रथम ब्रह्मा अर्थात् ब्रह्माण्ड
का नियंत्रक उत्पन्न होता है। इस प्रथम उद्भूत जीव का कोई भौतिक पिता नहीं होता यद्यपि बाकी सभी के पिता होते हैं, अतएव वह स्वयम्भू कहलाता है। प्रलय के समय वह नारायण के साथ सो जाता है और जब दूसरी सृष्टि होती है, तो वह इसी तरह से उत्पन्न होता है। इस विवरण से हमें स्थूल विराट् रूप, सूक्ष्म हिरण्यगर्भ तथा भौतिक सृजन शक्ति ब्रह्मा—इन तीनों का बोध होता है।
 
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥