श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 8: गर्भोदकशायी विष्णु से ब्रह्मा का प्राकट्य  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक
तस्यां स चाम्भोरुहकर्णिकाया-
मवस्थितो लोकमपश्यमान: ।
परिक्रमन् व्योम्नि विवृत्तनेत्र-
श्चत्वारि लेभेऽनुदिशं मुखानि ॥ १६ ॥
 
शब्दार्थ
तस्याम्—उसमें; स:—वे; च—तथा; अम्भ:—जल; रुह-कर्णिकायाम्—कमल का कोश; अवस्थित:—स्थित हुआ; लोकम्—जगत; अपश्यमान:—देख पाये बिना; परिक्रमन्—परिक्रमा करते हुए; व्योम्नि—आकाश में; विवृत्त-नेत्र:—आँखे चलाते हुए; चत्वारि—चार; लेभे—प्राप्त किये; अनुदिशम्—दिशाओं के रूप में; मुखानि—सिर ।.
 
अनुवाद
 
 कमल के फूल से उत्पन्न हुए ब्रह्मा जगत को नहीं देख सके यद्यपि वे कोश में स्थित थे। अत: उन्होंने सारे अन्तरिक्ष की परिक्रमा की और सभी दिशाओं में अपनी आँखें घुमाते समय उन्होंने चार दिशाओं के रूप में चार सिर प्राप्त किये।
 
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥