श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 8: गर्भोदकशायी विष्णु से ब्रह्मा का प्राकट्य  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक
तस्माद्युगान्तश्वसनावघूर्ण-
जलोर्मिचक्रात्सलिलाद्विरूढम् ।
उपाश्रित: कञ्जमु लोकतत्त्वं
नात्मानमद्धाविददादिदेव: ॥ १७ ॥
 
शब्दार्थ
तस्मात्—वहाँ से; युग-अन्त—युग के अन्त में; श्वसन—प्रलय की वायु; अवघूर्ण—गति के कारण; जल—जल; ऊर्मि- चक्रात्—भँवरों में से; सलिलात्—जल से; विरूढम्—उन पर स्थित; उपाश्रित:—आश्रय के रूप में; कञ्जम्—कमल के फूल को; उ—आश्चर्य में; लोक-तत्त्वम्—सृष्टि का रहस्य; न—नहीं; आत्मानम्—स्वयं को; अद्धा—पूर्णरूपेण; अविदत्—समझ सका; आदि-देव:—प्रथम देवता ।.
 
अनुवाद
 
 उस कमल पर स्थित ब्रह्मा न तो सृष्टि को, न कमल को, न ही अपने आपको भलीभाँति समझ सके। युग के अन्त में प्रलय वायु जल तथा कमल को बड़ी-बड़ी भँवरों में हिलाने लगी।
 
तात्पर्य
 ब्रह्माजी अपने जन्म, कमल तथा जगत् के विषय में भ्रान्ति में पड़े रहे, यद्यपि उन्होंने एक युग तक इन्हें समझने की कोशिश की जो मनुष्यों के सौर वर्षों की गणना के परे है। अतएव कोई भी व्यक्ति मात्र मानसिक चिन्तन द्वारा सृष्टि तथा विराट ब्रह्माण्ड के रहस्य को नहीं जान सकता। मनुष्य की क्षमता इतनी सीमित है कि परमेश्वर की सहायता के बिना वह सृजन, स्थिति तथा संहार के रूप में भगवान् की इच्छा के रहस्य को नहीं समझ सकता।
 
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