श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 8: गर्भोदकशायी विष्णु से ब्रह्मा का प्राकट्य  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक
क एष योऽसावहमब्जपृष्ठ
एतत्कुतो वाब्जमनन्यदप्सु ।
अस्ति ह्यधस्तादिह किञ्चनैत-
दधिष्ठितं यत्र सता नु भाव्यम् ॥ १८ ॥
 
शब्दार्थ
क:—कौन; एष:—यह; य: असौ अहम्—जो मैं हूँ; अब्ज-पृष्ठे—कमल के ऊपर; एतत्—यह; कुत:—कहाँ से; वा—अथवा; अब्जम्—कमल का फूल; अनन्यत्—अन्यथा; अप्सु—जल में; अस्ति—है; हि—निश्चय ही; अधस्तात्—नीचे से; इह—इस में; किञ्चन—कुछ भी; एतत्—यह; अधिष्ठितम्—स्थित; यत्र—जिसमें; सता—स्वत:; नु—या नहीं; भाव्यम्—होना चाहिए ।.
 
अनुवाद
 
 ब्रह्माजी ने अपनी अनभिज्ञता से विचार किया : इस कमल के ऊपर स्थित मैं कौन हूँ? यह (कमल) कहाँ से फूटकर निकला है? इसके नीचे कुछ अवश्य होना चाहिए और जिससे यह कमल निकला है उसे जल के भीतर होना चाहिए।
 
तात्पर्य
 प्रारम्भ में विराट जगत की सृष्टि के विषय में ब्रह्मा के चिन्तन का विषय अब भी मानसिक चिन्तकों के लिए जैसे का तैसा बना हुआ है। सर्वाधिक बद्धिमान् व्यक्ति वह है, जो अपने निजी अस्तित्व तथा सम्पूर्ण विराट जगत
के कारण को ढूँढने का प्रयास करता है और इस तरह से वह परम कारण को खोजने का यत्न करता है। यदि तपस्या तथा अध्यवसाय के साथ उसका प्रयास उचित ढंग से सम्पन्न होता है, तो उसे अवश्यमेव सफलता का श्रेय प्राप्त होगा।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥