श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 8: गर्भोदकशायी विष्णु से ब्रह्मा का प्राकट्य  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक
ततो निवृत्तोऽप्रतिलब्धकाम:
स्वधिष्ण्यमासाद्य पुन: स देव: ।
शनैर्जितश्वासनिवृत्तचित्तो
न्यषीददारूढसमाधियोग: ॥ २१ ॥
 
शब्दार्थ
तत:—तत्पश्चात्; निवृत्त:—उस प्रयास से विरत होकर; अप्रतिलब्ध-काम:—वांछित लक्ष्य को प्राप्त किये बिना; स्व धिष्ण्यम्—अपने आसन पर; आसाद्य—पहुँच कर; पुन:—फिर; स:—वह; देव:—देवता; शनै:—अविलम्ब; जित-श्वास— श्वास को नियंत्रित करते हुए; निवृत्त—विरत; चित्त:—बुद्धि; न्यषीदत्—बैठ गया; आरूढ—विश्वास में; समाधि-योग:— भगवान् का ध्यान करने के लिए ।.
 
अनुवाद
 
 तत्पश्चात् वाँछित लक्ष्य प्राप्त करने में असमर्थ होकर वे ऐसी खोज से विमुख हो गये और पुन: कमल के ऊपर आ गये। इस तरह इन्द्रियविषयों को नियंत्रित करते हुए उन्होंने अपना मन परमेश्वर पर एकाग्र किया।
 
तात्पर्य
 समाधि में सबों के परम कारण पर मन को एकाग्र करना होता है, चाहे मनुष्य को इसका ज्ञान हो या न हो कि परमेश्वर साकार हैं, निराकार हैं या अन्तर्यामी हैं। ब्रह्म में मन की एकाग्रता निश्चय ही एक प्रकार से भक्ति है। निजी इन्द्रियों के प्रयासों को रोकना और परम कारण पर चित्त को एकाग्र करना आत्मसमर्पण का लक्षण है और जब आत्मसमर्पण उपस्थित होता है, तो वह भक्ति का निश्चित लक्षण है। यदि अपने जीवन के चरम कारण को जानने की इच्छा है, तो प्रत्येक जीव को भगवान् की भक्तिमय सेवा में लगने की आवश्यकता है।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥