श्रीमद् भागवतम
 
हिंदी में पढ़े और सुनें
भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 8: गर्भोदकशायी विष्णु से ब्रह्मा का प्राकट्य  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक  3.8.24 
प्रेक्षां क्षिपन्तं हरितोपलाद्रे:
सन्ध्याभ्रनीवेरुरुरुक्‍ममूर्ध्न: ।
रत्नोदधारौषधिसौमनस्य
वनस्रजो वेणुभुजाङ्‌घ्रि पाङ्‌घ्रे : ॥ २४ ॥
 
शब्दार्थ
प्रेक्षाम्—दृश्य; क्षिपन्तम्—उपहास करते हुए; हरित—हरा; उपल—मूँगे के; अद्रे:—पर्वत का; सन्ध्या-अभ्र-नीवे:— सांध्यकालीन आकाश का वस्त्र; उरु—महान्; रुक्म—स्वर्ण; मूर्ध्न:—शिखर पर; रत्न—रत्न; उदधार—झरने; औषधि—जड़ी बूटियाँ; सौमनस्य—दृश्य का; वन-स्रज:—फूल की माला; वेणु—वस्त्र; भुज—हाथ; अङ्घ्रिप—वृक्ष; अङ्घ्रे:—पाँव ।.
 
अनुवाद
 
 भगवान् के दिव्य शरीर की कान्ति मूँगे के पर्वत की शोभा का उपहास कर रही थी। मूँगे का पर्वत संध्याकालीन आकाश द्वारा सुन्दर ढंग से वस्त्राभूषित होता है, किन्तु भगवान् का पीतवस्त्र उसकी शोभा का उपहास कर रहा था। इस पर्वत की चोटी पर स्वर्ण है, किन्तु रत्नजटित भगवान् का मुकुट इसकी हँसी उड़ा रहा था। पर्वत के झरने, जड़ी-बूटियाँ आदि फूलों के दृश्य के साथ मालाओं जैसे लगते हैं, किन्तु भगवान् का विराट शरीर तथा उनके हाथ-पाँव रत्नों, मोतियों, तुलसीदल तथा फूलमालाओं से अलंकृत होकर उस पर्वत के दृश्य का उपहास कर रहे थे।
 
तात्पर्य
 प्रकृति का दृश्यात्मक सौन्दर्य जो सबों को चकित करता है भगवान् के दिव्य शरीर का विकृत प्रतिबिम्ब माना जा सकता है। अत: जो व्यक्ति भगवान् के सौन्दर्य द्वारा आकृष्ट होता है, वह भौतिक प्रकृति के सौन्दर्य से आकृष्ट नहीं होता, यद्यपि वह इस सौन्दर्य को कम नहीं समझता। भगवद्गीता (२.५९) में वर्णन आया है कि जो परम द्वारा आकृष्ट है, वह अन्य किसी निकृष्ट वस्तु द्वारा आकृष्ट नहीं होता।
 
शेयर करें
       
 
  All glories to Srila Prabhupada. All glories to वैष्णव भक्त-वृंद
  Disclaimer: copyrights reserved to BBT India and BBT Intl.

 
About Us | Terms & Conditions
Privacy Policy | Refund Policy
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥