श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 8: गर्भोदकशायी विष्णु से ब्रह्मा का प्राकट्य  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक
मुखेन लोकार्तिहरस्मितेन
परिस्फुरत्कुण्डलमण्डितेन ।
शोणायितेनाधरबिम्बभासा
प्रत्यर्हयन्तं सुनसेन सुभ्र्वा ॥ २७ ॥
 
शब्दार्थ
मुखेन—मुख के संकेत से; लोक-आर्ति-हर—भक्तों के कष्ट को हरनेवाले; स्मितेन—हँसी के द्वारा; परिस्फुरत्—चकाचौंध करते; कुण्डल—कुण्डल से; मण्डितेन—सुसज्जित; शोणायितेन—स्वीकार करते हुए; अधर—अपने होठों का; बिम्ब— प्रतिबिम्ब; भासा—किरणें; प्रत्यर्हयन्तम्—आदान-प्रदान करते हुए; सु-नसेन—अपनी मनोहर नाक से; सु-प्वा—तथा मनोहर भौहों से ।.
 
अनुवाद
 
 उन्होंने भक्तों की सेवा भी स्वीकार की और अपनी सुन्दर हँसी से उनका कष्ट मिटा दिया। कुंडलों से सज्जित उनके मुख का प्रतिबिम्ब अत्यन्त मनोहारी था, क्योंकि यह उनके होठों की किरणों तथा उनकी नाक एवं भौंहों की सुन्दरता से जगमगा रहा था।
 
तात्पर्य
 भगवान् अपनी भक्ति से अत्यधिक अनुग्रहीत होते हैं। आध्यात्मिक कार्यकलापों के विभिन्न क्षेत्रों में अनेक अध्यात्मवादी हैं, किन्तु भगवान् की भक्ति-मय सेवा अद्वितीय होती है। भक्तजन अपनी सेवा के बदले में भगवान् से कुछ भी नहीं माँगते। यहाँ तक कि भगवान् के द्वारा प्रदान की जाने वाली सर्वाधिक इच्छित मुक्ति से भी वे इनकार कर देते हैं। इस तरह भगवान् एक प्रकार से भक्तों के ऋणी बन जाते हैं और वे अपनी सदा मोहक मुसकान से ही भक्तों की सेवा से उऋण होने का प्रयास कर सकते हैं। भक्तजन भगवान् के हँसमुख मुद्रा से सदा तुष्ट रहते हैं और जीवंत होते रहते हैं। भक्तों को इस तरह जीवंत देखकर भगवान् और अधिक तुष्ट होते हैं। इस तरह सेवा तथा स्वीकृति के ऐसे आदान-प्रदान से भगवान् तथा भक्तों के बीच सतत एक दिव्य स्पर्धा चलती जाती है।
 
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  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥