श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 8: गर्भोदकशायी विष्णु से ब्रह्मा का प्राकट्य  »  श्लोक 3

 
श्लोक
आसीनमुर्व्यां भगवन्तमाद्यं
सङ्कर्षणं देवमकुण्ठसत्त्वम् ।
विवित्सवस्तत्त्वमत: परस्य
कुमारमुख्या मुनयोऽन्वपृच्छन् ॥ ३ ॥
 
शब्दार्थ
आसीनम्—विराजमान; उर्व्याम्—ब्रह्माण्ड की तली पर; भगवन्तम्—भगवान् को; आद्यम्—आदि; सङ्कर्षणम्—संकर्षण को; देवम्—भगवान्; अकुण्ठ-सत्त्वम्—अबाध ज्ञान; विवित्सव:—जानने के लिए उत्सुक; तत्त्वम् अत:—इस प्रकार का सत्य; परस्य—भगवान् के विषय में; कुमार—बाल सन्त; मुख्या:—इत्यादि, प्रमुख; मुनय:—मुनियों ने; अन्वपृच्छन्—इसी तरह से पूछा ।.
 
अनुवाद
 
 कुछ काल पूर्व तुम्हारी ही तरह कुमार सन्तों में प्रमुख सनत् कुमार ने अन्य महर्षियों के साथ जिज्ञासावश ब्रह्माण्ड की तली में स्थित भगवान् संकर्षण से भगवान् वासुदेव विषयक सत्यों के बारे में पूछा था।
 
तात्पर्य
 यह इस कथन का स्पष्टीकरण है कि भगवान् ने प्रत्यक्ष रूप से श्रीमद्भागवत के विषय में कहा। यहाँ पर बताया गया है कि कब और किससे भागवत कही गई। विदुर द्वारा
पूछे गये प्रश्नों के ही समान प्रश्न सनत्कुमार जैसे महामुनियों ने पूछे थे और भगवान् वासुदेव के स्वांश भगवान् संकर्षण ने उनके उत्तर दिये थे।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥