श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 8: गर्भोदकशायी विष्णु से ब्रह्मा का प्राकट्य  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक
चराचरौको भगवन्महीध्र-
महीन्द्रबन्धुं सलिलोपगूढम् ।
किरीटसाहस्रहिरण्यश‍ृङ्ग-
माविर्भवत्कौस्तुभरत्नगर्भम् ॥ ३० ॥
 
शब्दार्थ
चर—गतिशील पशु; अचर—स्थिर वृक्ष; ओक:—स्थान या स्थिति; भगवत्—भगवान्; महीध्रम्—पर्वत; अहि-इन्द्र—श्री अनन्तदेव; बन्धुम्—मित्र; सलिल—जल; उपगूढम्—निमग्न; किरीट—मुकुट; साहस्र—हजारों; हिरण्य—स्वर्ण; शृङ्गम्— चोटियाँ; आविर्भवत्—प्रकट किया; कौस्तुभ—कौस्तुभ मणि; रत्न-गर्भम्—समुद्र ।.
 
अनुवाद
 
 विशाल पर्वत की भाँति भगवान् समस्त जड़ तथा चेतन जीवों के लिए आवास की तरह खड़े हैं। वे सर्पों के मित्र हैं, क्योंकि अनन्त देव उनके मित्र हैं। जिस तरह पर्वत में हजारों सुनहरी चोटियाँ होती हैं उसी तरह अनन्त नाग के सुनहरे मुकुटों वाले हजारों फनों से युक्त भगवान् दीख रहे थे। जिस तरह पर्वत कभी-कभी रत्नों से पूरित रहता है उसी तरह उनका शरीर मूल्यवान रत्नों से पूर्णतया सुशोभित था। जिस तरह कभी-कभी पर्वत समुद्र जल में डूबा रहता है उसी तरह भगवान् कभी-कभी प्रलय-जल में डूबे रहते हैं।
 
 
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  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥