श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 8: गर्भोदकशायी विष्णु से ब्रह्मा का प्राकट्य  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक
तर्ह्येव तन्नाभिसर:सरोज-
मात्मामम्भ: श्वसनं वियच्च ।
ददर्श देवो जगतो विधाता
नात: परं लोकविसर्गद‍ृष्टि: ॥ ३२ ॥
 
शब्दार्थ
तर्हि—अत:; एव—निश्चय ही; तत्—उसकी; नाभि—नाभि; सर:—झील; सरोजम्—कमल का फूल; आत्मानम्—ब्रह्मा; अम्भ:—प्रलय का जल; श्वसनम्—सुखाने वाली वायु; वियत्—आकाश; च—भी; ददर्श—देखा; देव:—देवता; जगत:— ब्रह्माण्ड का; विधाता—भाग्य का निर्माता; न—नहीं; अत: परम्—परे; लोक-विसर्ग—विराट जगत की सृष्टि; दृष्टि:— चितवन ।.
 
अनुवाद
 
 जब ब्रह्माण्ड के भाग्य विधाता ब्रह्मा ने भगवान् को इस प्रकार देखा तो उसी समय उन्होंने सृष्टि पर नजर दौड़ाई। ब्रह्मा ने विष्णु की नाभि में झील (नाभि सरोवर) तथा कमल देखा और उसी के साथ प्रलयकारी जल, सुखाने वाली वायु तथा आकाश को भी देखा। सब कुछ उन्हें दृष्टिगोचर हो गया।
 
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥