श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 8: गर्भोदकशायी विष्णु से ब्रह्मा का प्राकट्य  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक
स कर्मबीजं रजसोपरक्त:
प्रजा: सिसृक्षन्नियदेव दृष्ट्वा ।
अस्तौद्विसर्गाभिमुखस्तमीड्य-
मव्यक्तवर्त्मन्यभिवेशितात्मा ॥ ३३ ॥
 
शब्दार्थ
स:—वह (ब्रह्मा); कर्म-बीजम्—सांसारिक कार्यों का बीज; रजसा उपरक्त:—रजोगुण द्वारा प्रेरित; प्रजा:—जीव; सिसृक्षन्— सन्तान उत्पन्न करने की इच्छा से; इयत्—सृष्टि के सभी पाँचों कारण; एव—इस तरह; दृष्ट्वा—देखकर; अस्तौत्—स्तुति की; विसर्ग—भगवान् द्वारा सृष्टि के पश्चात् सृष्टि; अभिमुख:—की ओर; तम्—उसको; ईड्यम्—पूजनीय; अव्यक्त—दिव्य; वर्त्मनि—के मार्ग पर; अभिवेशित—स्थिर; आत्मा—मन ।.
 
अनुवाद
 
 इस तरह रजोगुण से प्रेरित ब्रह्मा सृजन करने के लिए उन्मुख हुए और भगवान् द्वारा सुझाये गये सृष्टि के पाँच कारणों को देखकर वे सृजनशील मनोवृत्ति के मार्ग पर सादर स्तुति करने लगे।
 
तात्पर्य
 रजोगुण में होते हुए भी इस संसार में किसी वस्तु का सृजन करने के लिए आवश्यक शक्ति हेतु परमेश्वर की शरण ग्रहण करनी पड़ती है। किसी प्रयास के सफल समापन का यही मार्ग है।
 
इस प्रकार श्रीमद्भागवत के तृतीय स्कंध के अन्तर्गत “गर्भोदकशायी विष्णु से ब्रह्मा का प्राकट्य” नामक आठवें अध्याय के भक्तिवेदान्त तात्पर्य पूर्ण हुए।
 
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥