श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 8: गर्भोदकशायी विष्णु से ब्रह्मा का प्राकट्य  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक  3.8.9 
प्रोवाच मह्यं स दयालुरुक्तो
मुनि: पुलस्त्येन पुराणमाद्यम् ।
सोऽहं तवैतत्कथयामि वत्स
श्रद्धालवे नित्यमनुव्रताय ॥ ९ ॥
 
शब्दार्थ
प्रोवाच—कहा; मह्यम्—मुझसे; स:—उसने; दयालु:—दयालु; उक्त:—उपर्युक्त; मुनि:—मुनि; पुलस्त्येन—पुलस्त्य मुनि से; पुराणम् आद्यम्—समस्त पुराणों में अग्रगण्य; स: अहम्—और वह भी मैं; तव—तुम से; एतत्—यह; कथयामि—कहता हूँ; वत्स—पुत्र; श्रद्धालवे—श्रद्धालु के लिए; नित्यम्—सदैव; अनुव्रताय—अनुयायी के लिए ।.
 
अनुवाद
 
 जैसा कि पहले कहा जा चुका है महर्षि पराशर ने महर्षि पुलस्त्य के द्वारा कहे जाने पर मुझे अग्रगण्य पुराण (भागवत) सुनाया। हे पुत्र, जिस रूप में उसे मैंने सुना है उसी रूप में मैं तुम्हारे सम्मुख उसका वर्णन करूँगा, क्योंकि तुम सदा ही मेरे श्रद्धालु अनुयायी रहे हो।
 
तात्पर्य
 पुलस्त्य नामक महर्षि सारे असुरों के पिता हैं। एक बार पराशर ने यज्ञ करना प्राम्भ किया जिसमें सारे असुरों को जलाकर नष्ट किया जाना था, क्योंकि इन असुरों में से किसी एक ने उनके पिता का वध करके उसे निगल लिया था। महर्षि वसिष्ठ मुनि यज्ञ में पधारे और पराशर से अनुरोध किया कि इस घातक कृत्य को बन्द कर दें। मुनियों के समुदाय में वशिष्ठ के पद पर एवं प्रतिष्ठा के कारण पराशर उनके अनुरोध को टाल न सके, जब पराशर ने यज्ञ रोक दिया तो असुरों के पिता पुलस्त्य ने उनके ब्राह्मण स्वभाव की प्रशंसा की और यह आशीर्वाद दिया कि भविष्य में वे पुराणों के महान् वक्ता बनेंगे जो वेदों के पूरक ग्रंथ हैं। पराशर के कार्य की पुलस्त्य ने प्रशंसा की, क्योंकि पराशर ने क्षमा दान की अपनी ब्राह्मण शक्ति से असुरों को क्षमा कर दिया था। यज्ञ में पराशर सारे असुरों को नष्ट करने में समर्थ थे, किन्तु उन्होंने विचार किया, “असुरों की उत्पत्ति ही इस तरह हुई है कि वे जीवित प्राणियों, मनुष्यों तथा पशुओं को निगल जाते हैं, लेकिन मैं इतने भर के लिए क्षमा के अपने ब्राह्मण-गुण को क्यों छोड़ दूँ?” पुराणों के महान् वक्ता पराशर ने सर्वप्रथम श्रीमद्भागवत-पुराण के विषय में बतलाया, क्योंकि यह समस्त पुराणों में अग्रगण्य है। मैत्रेय मुनि ने पराशर से सुने गये भागवत का ही वर्णन करने की इच्छा प्रकट की। विदुर इसको सुनने के पात्र थे, क्योंकि वे श्रद्धालु थे तथा अपने वरिष्ठजनों से प्राप्त उपदेशों का पालन करने वाले थे। इस तरह श्रीमद्भागवत अनादि काल से शिष्य-परम्परा द्वारा, व्यासदेव के समय के पहले से ही सुनाया जा रहा था। तथाकथित इतिहास-वेत्ता पुराणों को केवल कुछ सौ वर्ष प्राचीन बतलाते हैं, किन्तु वास्तविकता तो यह है कि पुराण अनादि काल से, संसारी लोगों तथा चिन्तनशील दार्शनिकों की समस्त ऐतिहासिक गणनाओं से बहुत पहले विद्यमान थे।
 
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