श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 9: सृजन-शक्ति के लिए ब्रह्मा द्वारा स्तुति  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक
नातिप्रसीदति तथोपचितोपचारै-
राराधित: सुरगणैर्हृदिबद्धकामै: ।
यत्सर्वभूतदययासदलभ्ययैको
नानाजनेष्ववहित: सुहृदन्तरात्मा ॥ १२ ॥
 
शब्दार्थ
न—कभी नहीं; अति—अत्यधिक; प्रसीदति—तुष्ट होता है; तथा—जितना; उपचित—ठाठबाट से; उपचारै:—पूजनीय साज सामग्री सहित; आराधित:—पूजित होकर; सुर-गणै:—देवताओं द्वारा; हृदि बद्ध-कामै:—समस्त प्रकार की भौतिक इच्छाओं से पूरित हृदय से; यत्—जो; सर्व—समस्त; भूत—जीव; दयया—उन पर अहैतुकी कृपा दिखाने के लिए; असत्—अभक्त; अलभ्यया—प्राप्त न हो सकने से; एक:—अद्वितीय; नाना—विविध; जनेषु—जीवों में; अवहित:—अनुभूत; सुहृत्—शुभेच्छु मित्र; अन्त:—भीतर; आत्मा—परमात्मा ।.
 
अनुवाद
 
 हे प्रभु, आप उन देवताओं की पूजा से बहुत अधिक तुष्ट नहीं होते जो आपकी पूजा अत्यन्त ठाठ-बाट से तथा विविध साज-सामग्री के साथ करते तो हैं, किन्तु भौतिक लालसाओं से पूर्ण होते हैं। आप हर एक के हृदय में परमात्मा के रूप में अपनी अहैतुकी कृपा दर्शाने के लिए स्थित रहते हैं। आप नित्य शुभचिन्तक हैं, किन्तु आप अभक्तों के लिए अनुपलब्ध हैं।
 
तात्पर्य
 भौतिक मामलों के लिए नियुक्त प्रशासक देवलोक के देवता भी भगवान् के भक्त हैं। किन्तु इसी के साथ उनमें भौतिक ऐश्वर्य तथा इन्द्रियतृप्ति के लिए इच्छाएँ होती हैं। भगवान् इतने दयालु हैं कि वे उन्हें उनकी इच्छा से भी अधिक समस्त प्रकार का भौतिक सुख प्रदान करते हैं, किन्तु वे उनसे तुष्ट नहीं रहते, क्योंकि वे शुद्ध भक्त नहीं हैं। भगवान् यह नहीं चाहते कि उनके असंख्य पुत्रों (जीवों) में कोई भी तीन तापों वाले भौतिक जगत में रहकर जन्म, मृत्यु, बुढ़ापा तथा रोग के भौतिक कष्टों को लगातार भोगता रहे। स्वर्गलोक के देवता तथा इस लोक के अनेक भक्त भी भौतिक जगत में भगवद्भक्त बने रहकर भौतिक सुख का लाभ उठाना चाहते हैं। वे जीवन के निम्न पद पर आ गिरने का जोखिम उठाकर ऐसा करते हैं जिससे भगवान् उनसे असन्तुष्ट रहते हैं।

शुद्ध भक्तों को न तो किसी भौतिक भोग की आकांक्षा रहती है, न ही वे उससे विमुख रहते हैं। वे भगवान् की इच्छाओं से अपनी इच्छाओं को जोड़ देते हैं और अपने लिए वे कुछ भी नहीं करते। इसका उत्तम उदाहरण अर्जुन है। अर्जुन अपनी भावनाओं से पारिवारिक स्नेहवश युद्ध नहीं करना चाहता था, किन्तु श्रीमद्भगवद्गीता सुनने के बाद उसने भगवान् की इच्छा के लिए लडऩा स्वीकार किया। अतएव भगवान् शुद्ध भक्तों से अत्यधिक सन्तुष्ट रहते हैं, क्योंकि वे अपनी इन्द्रियतृप्ति के लिए कर्म न करके एकमात्र भगवान् की इच्छा के अनुसार कर्म करते हैं। परमात्मा रूप में वे हर एक के हृदय में सदैव स्थित रहते हैं और हर एक को अच्छी सलाह से लाभ उठाने का अवसर प्रदान करते हैं। अत: हर व्यक्ति को चाहिए कि इस अवसर का लाभ उठाते हुए पूर्ण मनोयोग से केवल उन्हीं की दिव्य प्रेमाभक्ति करे।

किन्तु अभक्तगण न तो देवताओं जैसे होते हैं न शुद्ध भक्तों जैसे, अपितु वे भगवान् के साथ दिव्य सम्बन्ध बनाने से विमुख रहते हैं। उन्होंने भगवान् के प्रति विद्रोह किया है; इसलिए उन्हें निरन्तर अपने कर्मों का फल भोगना पड़ता है।

भगवद्गीता (४.११) में कहा गया है : ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्—यद्यपि भगवान् हर जीव पर समान रूप से कृपालु हैं, किन्तु जीव अपनी ओर से भगवान् को कम या ज्यादा प्रसन्न कर सकते हैं। देवता सकाम भक्त कहलाते हैं अर्थात् वे भक्त जिनके मनों में भौतिक इच्छाएँ होती हैं, किन्तु शुद्ध भक्त निष्काम भक्त कहलाते हैं, क्योंकि उनकी अपने निजी स्वार्थ के लिए इच्छाएँ नहीं होतीं। सकाम भक्त स्व:हितार्थी होते हैं, क्योंकि वे अन्यों के विषय में नहीं सोचते, अतएव वे भगवान् को पूरी तरह से तुष्ट नहीं कर पाते, जबकि शुद्ध भक्तगण अभक्तों को भक्तों में बदलने के धर्मप्रचार का उत्तरदायित्व निभाते हैं, अत: वे भगवान् को देवताओं की अपेक्षा अधिक तुष्ट कर पाते हैं। भगवान् अभक्तों की ओर ध्यान भी नहीं देते यद्यपि वे हर एक के हृदय के भीतर शुभेच्छु तथा परमात्मा के रूप में आसीन रहते हैं। किन्तु वे उन्हें भी अपने ऐसे शुद्ध भक्तों के माध्यम से अपनी कृपा प्राप्त करने का अवसर प्रदान करते हैं, जो धर्मप्रचार कार्यों में लगे हुए हैं। कभी-कभी भगवान् स्वयं ही धर्म प्रचार के कार्यों के लिए अवतरित होते हैं जैसाकि चैतन्य महाप्रभु के रूप में किया था। किन्तु अधिकांशतया वे अपने प्रामाणिक प्रतिनिधियों को भेजते हैं और इस तरह वे अभक्तों के प्रति अपनी अहैतुकी कृपा प्रदर्शित करते हैं। भगवान् अपने शुद्ध भक्तों से इतना तुष्ट रहते हैं कि वे उन्हें धर्म प्रचार की सफलता का श्रेय देना चाहते हैं, यद्यपि वे इस कार्य को स्वयं कर सकते थे। सकाम भक्तों की तुलना में, अपने शुद्ध निष्काम भक्तों के साथ उनकी तुष्टि का यही संकेत है। भगवान् ऐसे दिव्यकार्यों के साथ ही पक्षपात के आरोप से मुक्त रहते हैं और अपने भक्तों के साथ अपनी प्रसन्नता प्रकट करते हैं।

अब प्रश्न यह उठता है : यदि भगवान् अभक्तों के हृदय में भी आसीन रहते हैं, तो फिर वे भक्त बनने के लिए प्रेरित क्यों नहीं होते? इसका उत्तर यह है कि ढ़ीढ अभक्त उस बंजड़ या ऊसर खेत की तरह हैं जहाँ कोई भी कृषि-कार्य सफल नहीं हो सकता। भगवान् का भिन्नांश होने से पृथक् जीव को स्वल्प स्वतंत्रता प्राप्त है और इस स्वल्प स्वतंत्रता का दुरुपयोग करके अभक्तगण भगवान् तथा धर्म प्रचार के कार्य में लगे उनके शुद्ध भक्त, दोनों ही के प्रति अपराध पर अपराध करते जाते हैं। ऐसे कार्यों के परिणामस्वरूप वे ऊसर खेत की तरह बंजड़ बन जाते हैं जिसमें उत्पादन कर पाने की कोई शक्ति नहीं रहती।

 
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  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥