श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 9: सृजन-शक्ति के लिए ब्रह्मा द्वारा स्तुति  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक
पुंसामतो विविधकर्मभिरध्वराद्यै-
र्दानेन चोग्रतपसा परिचर्यया च ।
आराधनं भगवतस्तव सत्क्रियार्थो
धर्मोऽर्पित: कर्हिचिद्‌म्रियते न यत्र ॥ १३ ॥
 
शब्दार्थ
पुंसाम्—लोगों का; अत:—इसलिए; विविध-कर्मभि:—नाना प्रकार के सकाम कर्मों द्वारा; अध्वर-आद्यै:—वैदिक अनुष्ठान सम्पन्न करने से; दानेन—दान के द्वारा; च—तथा; उग्र—अत्यन्त कठोर; तपसा—तपस्या से; परिचर्यया—दिव्य सेवा द्वारा; च—भी; आराधनम्—पूजा; भगवत:—भगवान् की; तव—तुम्हारा; सत्-क्रिया-अर्थ:—एकमात्र आपको प्रसन्न करने के लिए; धर्म:—धर्म; अर्पित:—इस प्रकार अर्पित; कर्हिचित्—किसी समय; म्रियते—विनष्ट होता है; न—कभी नहीं; यत्र— वहाँ ।.
 
अनुवाद
 
 किन्तु वैदिक अनुष्ठान, दान, कठोर तपस्या तथा दिव्य सेवा जैसे पुण्य कार्य भी, जो लोगों द्वारा सकाम फलों को आपको अर्पित करके आपकी पूजा करने तथा आपको तुष्ट करने के उद्देश्य से किये जाते हैं, लाभप्रद होते हैं। धर्म के ऐसे कार्य व्यर्थ नहीं जाते।
 
तात्पर्य
 परम भक्ति जो नौ विभिन्न आध्यात्मिक कार्य—यथा श्रवण, कीर्तन, स्मरण, अर्चन, वन्दन इत्यादि द्वारा सम्पन्न किए जाते हैं, तडक़-भडक़ स्वभाव के लोगों को सदैव अच्छी नहीं लगती। वे तो वैदिक बाह्य अनुष्ठानों तथा सामाजिक धार्मिक दिखावे के दूसरे खर्चीले प्रदर्शनों से अधिक आकृष्ट होते हैं। किन्तु वैदिक आदेशों के अनुसार विधि यह है कि सारे पुण्य कर्मों के फल परमेश्वर को अर्पित किये जाँय। भगवद्गीता (९.२७) में भगवान् यह माँग करते हैं कि मनुष्य दैनिक कार्यों में जो भी करे यथा पूजा, यज्ञ तथा दान, उन सबका फल एकमात्र उन्हें ही अर्पित किया जाय। परमेश्वर को पुण्य कर्मों के फलों का यह अर्पण भगवान् की भक्ति का एक लक्षण है, जिसका स्थायी महत्त्व होता है, जबकि अपने लिए उन फलों का भोग केवल क्षणिक ही होता है। भगवान् के निमित्त किया गया कोई भी कार्य स्थायी निधि है और यह भगवान् की शुद्ध भक्ति तक क्रमश: उन्नति के लिए अदृश्य पुण्य के रूप में संचित होती है। ये अलक्षित पुण्य कर्म एक न एक दिन परमेश्वर की कृपा से पूर्ण भक्ति के रूप में प्रतिफलित होंगे। अतएव परमेश्वर के निमित्त किये गये किसी भी पुण्य कर्म की संस्तुति यहाँ पर उन लोगों के लिए भी की जाती है, जो शुद्ध भक्त नहीं हैं।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥