श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 9: सृजन-शक्ति के लिए ब्रह्मा द्वारा स्तुति  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक
शश्वत्स्वरूपमहसैव निपीतभेद-
मोहाय बोधधिषणाय नम: परस्मै ।
विश्वोद्भवस्थितिलयेषु निमित्तलीला-
रासाय ते नम इदं चकृमेश्वराय ॥ १४ ॥
 
शब्दार्थ
शश्वत्—शाश्वत रूप से; स्वरूप—दिव्य रूप; महसा—महिमा के द्वारा; एव—निश्चय ही; निपीत—विभेदित; भेद—अन्तर; मोहाय—मोहमयी धारणा के हेतु; बोध—आत्म-ज्ञान; धिषणाय—बुद्धि; नम:—नमस्कार; परस्मै—ब्रह्म को; विश्व-उद्भव—विराट जगत की सृष्टि; स्थिति—पालन; लयेषु—संहार भी; निमित्त—के हेतु; लीला—ऐसी लीलाओं से; रासाय—भोग हेतु; ते—तुम्हें; नम:—नमस्कार; इदम्—यह; चकृम—मैं करता हूँ; ईश्वराय—परमेश्वर को ।.
 
अनुवाद
 
 मैं उन परब्रह्म को नमस्कार करता हूँ जो अपनी अन्तरंगा शक्ति के द्वारा शाश्वत विशिष्ट अवस्था में रहते हैं। उनका विभेदित न किया जा सकने वाला निर्विशेष स्वरूप आत्म-साक्षात्कार हेतु बुद्धि द्वारा पहचाना जाता है। मैं उनको नमस्कार करता हूँ जो अपनी लीलाओं के द्वारा विराट जगत के सृजन, पालन तथा संहार का आनन्द लेते हैं।
 
तात्पर्य
 परमेश्वर अपनी अन्तरंगा शक्ति द्वारा जीवों से सदैव विभेदित होते हैं, यद्यपि वे स्वरूपसिद्ध बुद्धि के द्वारा अपने निर्विशेष रूप में भी समझे जाते हैं। अतएव भगवद्भक्त भगवान् के निर्विशेष रूप को सादर नमस्कार करते हैं। यहाँ पर रास शब्द महत्त्वपूर्ण है। रासनृत्य भगवान् कृष्ण द्वारा गोपियों के संग में वृन्दावन में सम्पन्न किया जाता है और गर्भोदकशायी विष्णु भी अपनी उस बहिरंगा शक्ति के साथ रास के भोग में लगे रहते हैं जिसके द्वारा वे सम्पूर्ण भौतिक जगत का सृजन, पालन तथा संहार करते हैं। अप्रत्यक्ष रूप से ब्रह्माजी उन भगवान् श्रीकृष्ण को सादर नमस्कार करते हैं, जो सदैव गोपियों के साथ रासभोग में लगे रहते हैं जिसकी पुष्टि गोपाल तापनी उपनिषद् में निम्नलिखित शब्दों द्वारा हुई है—परार्धान्ते सोऽबुध्यत गोपवेशो मे पुरुष: पुरस्तादाविर्बभूव भगवान् तथा जीव के बीच का अन्तर स्पष्ट रूप से तब अनुभव किया जाता है जब उनकी अन्तरंगा शक्ति को समझने के लिए पर्याप्त बुद्धि होती है, जो उस बहिरंगा शक्ति से भिन्न है, जिसके द्वारा वे भौतिक सृष्टि को सम्भव बनाते हैं।
 
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