श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 9: सृजन-शक्ति के लिए ब्रह्मा द्वारा स्तुति  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक
यस्माद्‌बिभेम्यहमपि द्विपरार्धधिष्ण्य-
मध्यासित: सकललोकनमस्कृतं यत् ।
तेपे तपो बहुसवोऽवरुरुत्समान-
स्तस्मै नमो भगवतेऽधिमखाय तुभ्यम् ॥ १८ ॥
 
शब्दार्थ
यस्मात्—जिससे; बिभेमि—डरता हूँ; अहम्—मैं; अपि—भी; द्वि-पर-अर्ध—४,३०,००,००,०००×२×३०×१२×१०० सौर वर्षों की सीमा तक; धिष्ण्यम्—स्थान में; अध्यासित:—स्थित; सकल-लोक—अन्य सारे लोकों द्वारा; नमस्कृतम्—आदरित; यत्—जिसने; तेपे—किया; तप:—तपस्या; बहु-सव:—अनेकानेक वर्ष; अवरुरुत्समान:—आपको प्राप्त करने की इच्छा से; तस्मै—उन को; नम:—मैं नमस्कार करता हूँ; भगवते—भगवान् को; अधिमखाय—समस्त यज्ञों के भोक्ता; तुभ्यम्—आपको ।.
 
अनुवाद
 
 हे प्रभु, मैं आपको सादर नमस्कार करता हूँ जो अथक काल तथा समस्त यज्ञों के भोक्ता हैं। यद्यपि मैं ऐसे स्थान में स्थित हूँ जो दो परार्धों की अवधि तक विद्यमान रहेगा, और यद्यपि मैं ब्रह्माण्ड के अन्य सभी लोकों का अगुआ हूँ, और यद्यपि मैंने आत्म-साक्षात्कार हेतु अनेकानेक वर्षों तक तपस्या की है, फिर भी मैं आपको नमस्कार करता हूँ।
 
तात्पर्य
 ब्रह्माजी ब्रह्माण्ड के महानतम पुरुष हैं, क्योंकि उनकी आयु सबसे लम्बी है। वे अपने तप, प्रभाव, प्रतिष्ठा इत्यादि के कारण सर्वाधिक सम्माननीय पुरुष हैं फिर भी वे भगवान् को सादर नमस्कार करते हैं। अत: अन्य सारे लोग जो ब्रह्मा के पद से बहुत ही नीचे हैं उनके लिए यह अनिवार्य है कि वे उन्हीं की तरह कर्तव्य समझकर नमस्कार करें।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥