श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 9: सृजन-शक्ति के लिए ब्रह्मा द्वारा स्तुति  »  श्लोक 20

 
श्लोक
योऽविद्ययानुपहतोऽपि दशार्धवृत्त्या
निद्रामुवाह जठरीकृतलोकयात्र: ।
अन्तर्जलेऽहिकशिपुस्पर्शानुकूलां
भीमोर्मिमालिनि जनस्य सुखं विवृण्वन् ॥ २० ॥
 
शब्दार्थ
य:—जो, जिसने; अविद्यया—अविद्या से प्रभावित; अनुपहत:—प्रभावित हुए बिना; अपि—भी; दश-अर्ध—पाँच; वृत्त्या— अन्योन्य क्रिया; निद्राम्—नींद; उवाह—स्वीकार किया; जठरी—उदर के भीतर; कृत—ऐसा करते हुए; लोक-यात्र:—विभिन्न जीवों का पालन पोषण; अन्त:-जले—प्रलयरूपी जल के भीतर; अहि-कशिपु—सर्प-शय्या पर; स्पर्श-अनुकूलाम्—स्पर्श के लिए सुखी; भीम-ऊर्मि—प्रचण्ड लहरों की; मालिनि—शृंखला; जनस्य—बुद्धिमान पुरुष का; सुखम्—सुख; विवृण्वन्— प्रदर्शित करते हुए ।.
 
अनुवाद
 
 हे प्रभु, आप उस प्रलयकालीन जल में शयन करने का आनन्द लेते हैं जहाँ प्रचण्ड लहरें उठती रहती हैं और बुद्धिमान लोगों को अपनी नींद का सुख दिखाने के लिए आप सर्पों की शय्या का आनन्द भोगते हैं। उस काल में ब्रह्माण्ड के सारे लोक आपके उदर में स्थित रहते हैं।
 
तात्पर्य
 ऐसे लोग जो अपनी शक्ति की सीमा से परे नहीं सोच पाते, कुएं के उन मेंढकों के समान हैं, जो विशाल प्रशान्त महासागर की लम्बाई-चौड़ाई की कल्पना नहीं कर सकते। ऐसे लोग जब यह सुनते हैं कि भगवान् तो ब्रह्माण्ड के विशाल सागर में अपनी शय्या पर शयन करते हैं, तो वे इसे गप्प मान बैठते हैं। उन्हें आश्चर्य होता है कि कोई किस तरह पानी में लेट कर सुखपूर्वक सो सकता है। किन्तु थोड़ी सी बुद्धि लगाने पर इस मूर्खतापूर्ण आश्चर्य को कम किया जा सकता है। समुद्र की तली में ऐसे विविध जीव हैं, जो भोजन करने,
सोने, रक्षा करने तथा संभोग करने जैसे भौतिक शारीरिक कार्यों का भी आनन्द लेते हैं। यदि ऐसे नगण्य जीव जल के भीतर जीवन का आनन्द ले सकते हैं, तो सर्वशक्तिमान परमेश्वर सर्प के शीतल शरीर पर क्यों नहीं सो सकते और सागर की प्रचण्ड लहरों की उथल-पुथल का आनन्द क्यों नहीं ले सकते? भगवान् की विशेषता यह है कि उनके सारे कार्य दिव्य होते हैं और वे काल तथा दिक् की सीमाओं से बाधित हुए बिना कुछ भी तथा सब कुछ कर सकते हैं। वे भौतिक मान्यताओं के प्रति उदासीन रहकर अपना दिव्य आनन्द भोग सकते हैं।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥