श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 9: सृजन-शक्ति के लिए ब्रह्मा द्वारा स्तुति  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक
यन्नाभिपद्मभवनादहमासमीड्य
लोकत्रयोपकरणो यदनुग्रहेण ।
तस्मै नमस्त उदरस्थभवाय योग-
निद्रावसानविकसन्नलिनेक्षणाय ॥ २१ ॥
 
शब्दार्थ
यत्—जिसकी; नाभि—नाभि; पद्म—कमल रूपी; भवनात्—घर से; अहम्—मैं; आसम्—प्रकट हुआ; ईड्य—हे पूजनीय; लोक-त्रय—तीनों लोकों के; उपकरण:—सृजन में सहायक बनकर; यत्—जिसकी; अनुग्रहेण—कृपा से; तस्मै—उसको; नम:—मेरा नमस्कार; ते—तुमको; उदर-स्थ—उदर के भीतर स्थित; भवाय—ब्रह्माण्ड से युक्त; योग-निद्रा-अवसान—उस दिव्य निद्रा के अन्त होने पर; विकसत्—खिले हुए; नलिन-ईक्षणाय—जिसकी खुली आँखें कमलों के समान हैं उसे ।.
 
अनुवाद
 
 हे मेरी पूजा के लक्ष्य, मैं आपकी कृपा से ब्रह्माण्ड की रचना करने हेतु आपके कमल नाभि रूपी घर से उत्पन्न हुआ हूँ। जब आप नींद का आनन्द ले रहे थे, तब ब्रह्माण्ड के ये सारे लोक आपके दिव्य उदर के भीतर स्थित थे। अब आपकी नींद टूटी है, तो आपके नेत्र प्रात:काल में खिलते हुए कमलों की तरह खुले हुए हैं।
 
तात्पर्य
 ब्रह्माजी हमें प्रात: (४ बजे) से सायंकाल (१० बजे) तक के अर्चाविधान के शुभारम्भ की शिक्षा दे रहे हैं। भक्त को तडक़े अपने बिस्तर से उठकर भगवान् की प्रार्थना करनी होती है और प्रात:कालीन मंगल-आरति करने के अन्य विधि-विधान पूरे करने होते हैं। अभक्त मूर्ख-जन अर्चना की महत्ता न समझ सकने के कारण इन विधि-विधानों की आलोचना करते हैं, किन्तु उन्हें यह नहीं दिखता कि भगवान् भी स्वेच्छा से सोते हैं। ब्रह्म की निर्विशेष धारणा भक्ति-मार्ग के लिए इतनी बाधक है कि ढ़ीढ अभक्तों के संग रह पाना अत्यन्त कठिन है, क्योंकि वे सदैव भौतिक अवधारणाओं के अनुसार ही सोचते हैं।

निर्विशेषवादी सदैव उल्टा सोचते हैं। वे सोचते हैं कि चूँकि पदार्थ में रूप है इसलिए आत्मा रूपविहीन होगा। चूँकि पदार्थ में निद्रा है, अत: आत्मा में निद्रा नहीं हो सकती और चूँकि अर्चना में अर्चाविग्रह की निद्रा को स्वीकार किया जाता है, अत: अर्चना माया है। ये समस्त विचार मूलत: भौतिक हैं। तो भी सकारात्मक या नकारात्मक रूप से सोचना भौतिकता है। वेदों के श्रेष्ठ स्रोत से स्वीकार किया गया ज्ञान मानक होता है। श्रीमद्भागवत के इन श्लोकों में अर्चना की संस्तुति की गई है। सृजन का कार्य अपने हाथों में लेने से पूर्व ब्रह्मा ने देखा कि भगवान् प्रलयकालीन जल की लहरों में सर्प की शय्या में सो रहे हैं। इसलिए शयन करना भगवान् की अन्तरंगा शक्ति में निहित रहता है और भगवान् के शुद्ध भक्तगण, यथा ब्रह्मा तथा उनकी परम्परा के भक्त, इससे इनकार नहीं करते। यहाँ यह स्पष्ट कहा गया है कि भगवान् जल की प्रचण्ड लहरों के बीच अतीव सुखपूर्वक सो रहे थे जिसके द्वारा वे यह दिखाना चाह रहे थे कि वे अपनी दिव्य इच्छा से कुछ भी कर सकते हैं और किसी भी परिस्थिति में उन्हें विघ्न नहीं पहुचता है। मायावादी इस भौतिक अनुभव से परे सोच ही नहीं सकता, अतएव वह भगवान् की पानी में सोने की क्षमता को नकारता है। उसका दोष यही है कि वह भगवान् की तुलना अपने से करता है और वह तुलना भी एक भौतिक सोच है। समस्त मायावादी दर्शन मूलत: भौतिक है, क्योंकि यह नेति नेति (यह नहीं,वह नहीं) पर आधारित है। ऐसे विचार से किसी को पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को यथारूप में जानने का अवसर प्राप्त नहीं हो सकता।

 
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  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥