श्रीमद् भागवतम
 
हिंदी में पढ़े और सुनें
भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 9: सृजन-शक्ति के लिए ब्रह्मा द्वारा स्तुति  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक
एष प्रपन्नवरदो रमयात्मशक्त्या
यद्यत्करिष्यति गृहीतगुणावतार: ।
तस्मिन् स्वविक्रममिदं सृजतोऽपि चेतो
युञ्जीत कर्मशमलं च यथा विजह्याम् ॥ २३ ॥
 
शब्दार्थ
एष:—यह; प्रपन्न—शरणागत; वर-द:—वर देने वाला; रमया—लक्ष्मीदेवी के साथ रमण करते हुए; आत्म-शक्त्या—अपनी अन्तरंगा शक्ति सहित; यत् यत्—जो जो; करिष्यति—वह कर सके; गृहीत—स्वीकार करते हुए; गुण-अवतार:—सतोगुण का अवतार; तस्मिन्—उसको; स्व-विक्रमम्—सर्वशक्तिमत्ता से; इदम्—इस विराट जगत को; सृजत:—रचते हुए; अपि—भी; चेत:—हृदय; युञ्जीत—लगा रहे; कर्म—कार्य; शमलम्—भौतिक प्रभाव, व्याधि; च—भी; यथा—यथासम्भव; विजह्याम्—मैं त्याग सकता हूँ ।.
 
अनुवाद
 
 भगवान् सदा ही शरणागतों को वर देने वाले हैं। उनके सारे कार्य उनकी अन्तरंगा शक्ति रमा या लक्ष्मी के माध्यम से सम्पन्न होते हैं। मेरी उनसे यही विनती है कि भौतिक जगत के सृजन में वे मुझे अपनी सेवा में लगा लें और मेरी यही प्रार्थना है कि मैं अपने कर्मों द्वारा भौतिक रूप से प्रभावित न होऊँ, क्योंकि इस तरह मैं स्रष्टा होने की मिथ्या-प्रतिष्ठा त्यागने में सक्षम हो सकूँगा।
 
तात्पर्य
 भौतिक सृजन, पालन तथा संहार के निमित्त प्रकृति के तीन गुणावतार—ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश्वर—हैं। किन्तु विष्णु रूप में, अपनी अन्तरंगा शक्ति में भगवान् का अवतार सम्पूर्ण कार्यों के लिए परम शक्ति है। ब्रह्मा ने, जो सृजन के गुणों में सहायक मात्र हैं भगवान् के उपकरण रूप में अपने वास्तविक पद पर बने रहने की इच्छा व्यक्त की। न कि अपने को स्रष्टा होने की झूठी प्रतिष्ठा से गर्वित होने की। भगवान् का प्रिय बनने और उनका वर पाने की, यही विधि है। मूर्ख लोग अपने द्वारा निर्मित सम्पूर्ण सृजनों का श्रेय लेना चाहते हैं, किन्तु बुद्धिमान लोग यह भली-भाँति जानते हैं कि भगवान् की इच्छा के बिना एक पत्ती भी नहीं हिल सकती। इस तरह अद्भुत सृजनों का श्रेय भगवान् को मिलना चाहिए। एकमात्र आध्यात्मिक चेतना द्वारा ही मनुष्य अपने को भौतिक संसर्ग के कल्मष से मुक्त कर सकता है और भगवान् द्वारा प्रदत्त वर प्राप्त कर सकता है।
 
शेयर करें
       
 
  All glories to Srila Prabhupada. All glories to वैष्णव भक्त-वृंद
  Disclaimer: copyrights reserved to BBT India and BBT Intl.

 
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥