श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 9: सृजन-शक्ति के लिए ब्रह्मा द्वारा स्तुति  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक
नाभिहृदादिह सतोऽम्भसि यस्य पुंसो
विज्ञानशक्तिरहमासमनन्तशक्ते: ।
रूपं विचित्रमिदमस्य विवृण्वतो मे
मा रीरिषीष्ट निगमस्य गिरां विसर्ग: ॥ २४ ॥
 
शब्दार्थ
नाभि-ह्रदात्—नाभिरूपी झील से; इह—इस कल्प में; सत:—लेटे हुए; अम्भसि—जल में; यस्य—जिसका; पुंस:—भगवान् का; विज्ञान—सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की; शक्ति:—शक्ति; अहम्—मैं; आसम्—उत्पन्न हुआ था; अनन्त—असीम; शक्ते:— शक्तिशाली का; रूपम्—स्वरूप; विचित्रम्—विचित्र; इदम्—यह; अस्य—उसका; विवृण्वत:—प्रकट करते हुए; मे— मुझको; मा—नहीं; रीरिषीष्ट—लुप्त; निगमस्य—वेदों की; गिराम्—ध्वनियों का; विसर्ग:—कम्पन ।.
 
अनुवाद
 
 भगवान् की शक्तियाँ असंख्य हैं। जब वे प्रलय-जल में लेटे रहते हैं, तो उस नाभिरूपी झील से, जिसमें कमल खिलता है, मैं समग्र विश्वशक्ति के रूप में उत्पन्न होता हूँ। इस समय मैं विराट जगत के रूप में उनकी विविध शक्तियों को उद्धाटित करने में लगा हुआ हूँ। इसलिए मैं प्रार्थना करता हूँ कि अपने भौतिक कार्यों को करते समय मैं वैदिक स्तुतियों की ध्वनि से कहीं विचलित न हो जाऊँ।
 
तात्पर्य
 इस जगत का प्रत्येक व्यक्ति जो कि भगवान् की दिव्य प्रेमाभक्ति में लगा हुआ है अनेकानेक भौतिक गतिविधियों की ओर प्रवृत्त होता है और यदि वह अपने को भौतिक संसर्ग के प्रहार से बचा पाने में समर्थ नहीं होता तो वह आध्यात्मिक शक्ति से विपथ हो सकता है। भौतिक सृष्टि में ब्रह्मा को सभी प्रकार के जीवों का सृजन करना था जिस के साथ उन सबके शरीर उनकी भौतिक स्थितियों के अनुकूल हों। ब्रह्मा चाहते हैं कि भगवान् उनकी रक्षा करें, क्योंकि उनका सम्पर्क अनेकानेक दूषित जीवों से होना था। एक सामान्य ब्राह्मण अनेक पतित बद्धात्माओं की संगति के कारण अपने ब्रह्मतेज से नीचे गिर सकता है। सर्वोच्च ब्राह्मण के रूप में ब्रह्मा ऐसे पतन से भयभीत हैं, इसीलिए सुरक्षा के लिए वे भगवान् से प्रार्थना करते हैं। जीवन की आध्यात्मिक प्रगति में यह हर एक के लिए चेतावनी है। जब तक कोई भगवान् द्वारा पर्याप्त रूप से सुरक्षित न हो, वह अपने आध्यात्मिक पद से नीचे गिर सकता है, अतएव अपनी सुरक्षा के लिए तथा अपना कार्य करते रहने के लिए आशीर्वाद हेतु मनुष्य को निरन्तर भगवान् से प्रार्थना करनी होती है। श्री चैतन्य महाप्रभु ने भी अपना धर्मप्रचार कार्य अपने भक्तों को सौंप दिया था और उन्हें भौतिक संसर्ग के प्रहार के प्रति सुरक्षा का आश्वासन दे रखा था। वेदों में आध्यात्मिक जीवन के मार्ग को तेज उस्तरे की धार के समान बताया गया है। थोड़ी सी भी असावधानी से तुरन्त ही ऊहापोह तथा रक्तपात हो सकता है, किन्तु जो व्यक्ति पूर्णतया शरणागत है और अपने को सौंपे हुए कार्य को सम्पन्न करने में सदैव भगवान् से रक्षा की याचना करता रहता है उसे भौतिक कल्मष में गिरने का कोई भय नहीं रहता।
 
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