श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 9: सृजन-शक्ति के लिए ब्रह्मा द्वारा स्तुति  »  श्लोक 36
 
 
श्लोक
ज्ञातोऽहं भवता त्वद्य दुर्विज्ञेयोऽपि देहिनाम् ।
यन्मां त्वं मन्यसेऽयुक्तं भूतेन्द्रियगुणात्मभि: ॥ ३६ ॥
 
शब्दार्थ
ज्ञात:—ज्ञात; अहम्—मैं; भवता—तुम्हारे द्वारा; तु—लेकिन; अद्य—आज; दु:—कठिन; विज्ञेय:—जाना जा सकना; अपि— के बावजूद; देहिनाम्—बद्धजीव के लिए; यत्—क्योंकि; माम्—मुझको; त्वम्—तुम; मन्यसे—समझते हो; अयुक्तम्—बिना बने हुए; भूत—भौतिक तत्त्व; इन्द्रिय—भौतिक इन्द्रियाँ; गुण—भौतिक गुण; आत्मभि:—तथा मिथ्या अभिमान यथा बद्ध आत्मा द्वारा ।.
 
अनुवाद
 
 यद्यपि मैं बद्ध आत्मा द्वारा सरलता से ज्ञेय नहीं हूँ, किन्तु आज तुमने मुझे जान लिया है, क्योंकि तुम जानते हो कि मैं किसी भौतिक वस्तु से विशेष रूप से पाँच स्थूल तथा तीन सूक्ष्म तत्त्वों से नहीं बना हूँ।
 
तात्पर्य
 सर्वोच्च परम सत्य के ज्ञान के लिए यह आवश्यक नहीं है कि भौतिक जगत का निषेध किया जाय, अपितु इसके लिए आध्यात्मिक जगत का ज्ञान आवश्यक है। यह सोचना कि भौतिक जगत की अनुभूति स्वरूपों में की जाती है, इसलिए आध्यात्मिक जगत रूपविहीन होगा, आत्मा की निषेधात्मक भौतिक धारणा है। असली आध्यात्मिक धारणा तो यह है कि आध्यात्मिक स्वरूप भौतिक स्वरूप नहीं है। ब्रह्मा ने भगवान् के नित्य रूप की उस तरह से प्रशंसा की और भगवान् ने ब्रह्मा की आध्यात्मिक धारणा का अनुमोदन किया। भगवद्गीता में भगवान् ने कृष्ण के शरीर की उस भौतिक अवधारणा की निन्दा की है, जो इस कारण से उत्पन्न होती है कि वे एक मनुष्य की भाँति उपस्थित हैं। भगवान् अपने अनेकानेक आध्यात्मिक रूपों में से किसी एक में प्रकट हो सकते हैं, किन्तु वे न तो भौतिक वस्तु से बने होते हैं न ही उनके शरीर तथा आत्मा में कोई अन्तर होता है। भगवान् के आध्यात्मिक स्वरूप के चिन्तन की यही विधि है।
 
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  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥