श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 9: सृजन-शक्ति के लिए ब्रह्मा द्वारा स्तुति  »  श्लोक 39

 
श्लोक
प्रीतोऽहमस्तु भद्रं ते लोकानां विजयेच्छया ।
यदस्तौषीर्गुणमयं निर्गुणं मानुवर्णयन् ॥ ३९ ॥
 
शब्दार्थ
प्रीत:—प्रसन्न; अहम्—मैं; अस्तु—ऐसा ही हो; भद्रम्—समस्त आशीर्वाद; ते—तुमको; लोकानाम्—लोकों का; विजय— गुणगान की; इच्छया—तुम्हारी इच्छा से; यत्—वह जो; अस्तौषी:—तुमने प्रार्थना की है; गुण-मयम्—दिव्य गुणों का वर्णन करते हुए; निर्गुणम्—यद्यपि मैं समस्त भौतिक गुणों से रहित हूँ; मा—मुझको; अनुवर्णयन्—अच्छे ढंग से वर्णन करते हुए ।.
 
अनुवाद
 
 मेरे दिव्य गुण जो कि संसारी लोगों को सांसारिक प्रतीत होते हैं, उनका जो वर्णन तुम्हारे द्वारा प्रस्तुत किया गया है उससे मैं अतीव प्रसन्न हूँ। अपने कार्यों से समस्त लोकों को महिमामय करने की जो तुम्हारी इच्छा है उसके लिए मैं तुम्हें वर देता हूँ।
 
तात्पर्य
 ब्रह्मा जैसे शुद्ध भगवद्भक्त तथा उनकी शिष्य-परम्परा के भगवद्भक्त सैदव यही चाहते हैं कि ब्रह्माण्ड भर के सारे जीव भगवान् से अवगत हो लें। भक्त की इस इच्छा को सदैव भगवान् का आशीर्वाद प्राप्त होता है। कभी-कभी निर्विशेषवादी जन भगवान् नारायण की कृपा के लिए सतोगुण के साकार रूप में उनकी प्रार्थना करते हैं, किन्तु ऐसी प्रार्थनाओं
से भगवान् तुष्ट नहीं होते, क्योंकि इससे उनके वास्तविक दिव्य गुणों का गुणगान नहीं हो पाता। भगवान् के शुद्ध भक्त उन्हें सदैव अतिशय प्रिय होते हैं यद्यपि वे सभी जीवों के प्रति सदा कृपालु और दयापूर्ण रहते हैं। यहाँ पर गुणमयम् शब्द महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि यह भगवान् के दिव्य गुणों से युक्त होने का सूचक है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥