श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 9: सृजन-शक्ति के लिए ब्रह्मा द्वारा स्तुति  »  श्लोक 43
 
 
श्लोक
सर्ववेदमयेनेदमात्मनात्मात्मयोनिना ।
प्रजा: सृज यथापूर्वं याश्च मय्यनुशेरते ॥ ४३ ॥
 
शब्दार्थ
सर्व—समस्त; वेद-मयेन—पूर्ण वैदिक ज्ञान के अधीन; इदम्—यह; आत्मना—शरीर द्वारा; आत्मा—तुम; आत्म-योनिना— सीधे भगवान् से उत्पन्न; प्रजा:—जीव; सृज—उत्पन्न करो; यथा-पूर्वम्—पहले की ही तरह; या:—जो; च—भी; मयि—मुझमें; अनुशेरते—स्थित हैं ।.
 
अनुवाद
 
 मेरे आदेशों का पालन करके तुम पहले की तरह अपने पूर्ण वैदिक ज्ञान से तथा सर्वकारण-के-कारण-रूप मुझसे प्राप्त अपने शरीर द्वारा जीवों को उत्पन्न कर सकते हो।
 
 
 
  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥