श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 9: सृजन-शक्ति के लिए ब्रह्मा द्वारा स्तुति  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक
तावद्भयं द्रविणदेहसुहृन्निमित्तं
शोक: स्पृहा परिभवो विपुलश्च लोभ: ।
तावन्ममेत्यसदवग्रह आर्तिमूलं
यावन्न तेऽङ्‌घ्रिमभयं प्रवृणीत लोक: ॥ ६ ॥
 
शब्दार्थ
तावत्—तब तक; भयम्—भय; द्रविण—सम्पत्ति; देह—शरीर; सुहृत्—सम्बन्धी जन; निमित्तम्—के लिए; शोक:—शोक; स्पृहा—इच्छा; परिभव:—साज-सामग्री; विपुल:—अत्यधिक; च—भी; लोभ:—लालच; तावत्—उस समय तक; मम—मेरा; इति—इस प्रकार; असत्—नश्वर; अवग्रह:—दुराग्रहं; आर्ति-मूलम्—चिन्ता से पूर्ण; यावत्—जब तक; न—नहीं; ते—तुम्हारे; अङ्घ्रिम् अभयम्—सुरक्षित चरणकमल; प्रवृणीत—शरण लेते हैं; लोक:—संसार के लोग ।.
 
अनुवाद
 
 हे प्रभु, संसार के लोग समस्त भौतिक चिन्ताओं से उद्विग्न रहते हैं—वे सदैव भयभीत रहते हैं। वे सदैव धन, शरीर तथा मित्रों की रक्षा करने का प्रयास करते हैं, वे शोक तथा अवैध इच्छाओं एवं साज-सामग्री से पूरित रहते हैं तथा लोभवश “मैं” तथा “मेरे” की नश्वरधारणाओं पर अपने दुराग्रह को आधारित करते हैं। जब तक वे आपके सुरक्षित चरणकमलों की शरण ग्रहण नहीं करते तब तक वे ऐसी चिन्ताओं से भरे रहते हैं।
 
तात्पर्य
 कोई यह प्रश्न कर सकता है कि यदि कोई पारिवारिक मामलों के विचारों से उद्विग्न रहे तो किस तरह वह सदैव भगवान् के ही नाम, यश, गुण इत्यादि का चिन्तन कर सकता है? भौतिक जगत का हर व्यक्ति इन विचारों में डुबा रहता है कि वह किस तरह अपने परिवार का भरण-पोषण करे, किस तरह अपने धन की रक्षा करे, किस तरह अपने मित्रों तथा सम्बन्धियों के साथ मिलकर चले। इस तरह वह यथास्थिति बनाये रखने के प्रयास में सदैव भय तथा शोक से ग्रस्त रहता है। इस प्रश्न के उत्तरस्वरूप ब्रह्मा द्वारा कहा गया यह श्लोक अति उपयुक्त है।

भगवान् का शुद्ध भक्त कभी भी अपने को अपने घर का स्वामी नहीं मानता। वह हर वस्तु भगवान् के सर्वोच्च नियंत्रण पर छोड़ देता है, अत: उसे अपने परिवार के भरण-पोषण अथवा अपने परिवार के हितों की रक्षा करने का कोई भय नहीं सताता। इस शरणागति के कारण उसे सम्पत्ति के प्रति कोई आकर्षण नहीं रह जाता। यदि कोई आकर्षण रहता भी है, तो वह इन्द्रियतृप्ति के निमित्त न होकर भगवान् की सेवा के प्रति होता है। हो सकता है कि शुद्ध भक्त भी सामान्य व्यक्ति की तरह धन जोडऩे के प्रति आकृष्ट होता हो, किन्तु अन्तर यह है कि भक्त भगवान् की सेवा हेतु धन अर्जित करता है, जबकि सामान्य व्यक्ति अपने इन्द्रियभोग के लिए। इस तरह भक्त के लिए धन का अर्जन, चिन्ता का कारण नहीं बनता जिस तरह वह सांसारिक व्यक्ति के लिए होता है। चूँकि भक्त हर वस्तु को भगवान् के सेवा-भाव के रूप में स्वीकार करता है, अत: धन संग्रह रूपी विषदन्त उखाड़ दिये जाते हैं। यदि साँप का विष निकाल दिया जाय और तब वह किसी व्यक्ति को काटे तो उसका प्रभाव घातक नहीं होता है। इसी तरह भगवान् के निमित्त अर्जित धन के विषैले दाँत नहीं होते हैं और इसका प्रभाव घातक नहीं होता। शुद्ध भक्त जगत में सामान्य व्यक्ति की तरह रहते हुए भी भौतिक सांसारिक मामलों के फंदे में नहीं फंसता।

 
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