श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 9: सृजन-शक्ति के लिए ब्रह्मा द्वारा स्तुति  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक
यावत्पृथक्त्वमिदमात्मन इन्द्रियार्थ-
मायाबलं भगवतो जन ईश पश्येत् ।
तावन्न संसृतिरसौ प्रतिसंक्रमेत
व्यर्थापि दु:खनिवहं वहती क्रियार्था ॥ ९ ॥
 
शब्दार्थ
यावत्—जब तक; पृथक्त्वम्—विलगाव; इदम्—यह; आत्मन:—शरीर का; इन्द्रिय-अर्थ—इन्द्रियतृप्ति के लिए; माया बलम्—बहिरंगा शक्ति का प्रभाव; भगवत:—भगवान् का; जन:—व्यक्ति; ईश—हे प्रभु; पश्येत्—देखता है; तावत्—तब तक; न—नहीं; संसृति:—भौतिक जगत का प्रभाव; असौ—वह मनुष्य; प्रतिसङ्क्रमेत—लाँघ सकता है; व्यर्था अपि—यद्यपि अर्थहीन; दु:ख-निवहम्—अनेक दुख; वहती—लाते हुए; क्रिया-अर्था—सकाम कर्मों के लिए ।.
 
अनुवाद
 
 हे प्रभु, आत्मा के लिए भौतिक दुखों का कोई वास्तविक अस्तित्व नहीं होता। फिर भी जब तक बद्धात्मा शरीर को इन्द्रिय भोग के निमित्त देखता है तब तक वह आपकी बहिरंगा शक्ति द्वारा प्रभावित होने से भौतिक कष्टों के पाश से बाहर नहीं निकल पाता।
 
तात्पर्य
 भौतिक जगत में जीव का सारा कष्ट यह है कि उसे जीवन के स्वतंत्र होने की धारणा है। वह बद्ध तथा मुक्त दोनों ही दशाओं में सदैव परमेश्वर के नियमों पर आश्रित रहता है, किन्तु बहिरंगा शक्ति के प्रभाव से बद्धात्मा अपने को परमेश्वर की प्रभुता से मुक्त (स्वतंत्र) मानता है। उसकी स्वाभाविक स्थिति तो परमेश्वर की इच्छा से अपने को जोडऩा है, किन्तु जब तक वह ऐसा नहीं करता तब तक वह भवबन्धन की बेडिय़ों में जकड़ा रहेगा। जैसाकि भगवद्गीता (२.५५) में कहा गया है— प्रजहाति यदा कामान् सर्वान् पार्थ मनोगतान्—उसे मनोरथ द्वारा तैयार की गई सभी प्रकार की योजनाओं का परित्याग करना होता है। जीव को अपने आपको परमेश्वर की इच्छा के साथ जोडऩा होता है। इससे भव-पाश से निकलने में उसे सहायता मिलेगी।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥