श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 1: मनु की पुत्रियों की वंशावली  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक
पूर्णिमासूत विरजं विश्वगं च परन्तप ।
देवकुल्यां हरे: पादशौचाद्याभूत्सरिद्दिव: ॥ १४ ॥
 
शब्दार्थ
पूर्णिमा—पूर्णिमा ने; असूत—उत्पन्न किया; विरजम्—विरज नामक पुत्र; विश्वगम् च—तथा विश्वग नामक; परम्-तप—शत्रुओं का संहार करने वाले; देवकुल्याम्—देवकुल्या नामक पुत्री; हरे:—श्रीभगवान् के; पाद-शौचात्—चरणकमल को धोने वाले जल से; या—वह; अभूत्—हुई; सरित् दिव:—गंगा के तटों के अन्तर्गत दिव्य जल ।.
 
अनुवाद
 
 हे विदुर, कश्यप तथा पूर्णिमा नामक दो सन्तानों में से पूर्णिमा के तीन सन्तानें उत्पन्न हुईं जिनके नाम विरज, विश्वग तथा देवकुल्या थे। इन तीनों में से देवकुल्या श्रीभगवान् के चरणकमल को धोने वाला जल थी, जो बाद में स्वर्गलोक की गंगा में बदल गई।
 
तात्पर्य
 कश्यप तथा पूर्णिमा इन दो में से यहाँ पर पूर्णिमा के वंशजों का वर्णन है। इनका विस्तृत वर्णन छठे स्कंध में दिया जाएगा। यहाँ पर यह ज्ञात होता है कि देवकुल्या गंगा नदी की प्रधान विग्रह है, जो स्वर्ग लोक से इस लोक में अवतरित होती है और पवित्र मानी जाती हैं, क्योंकि वह श्रीभगवान् हरि के चरणकमलों का स्पर्श करती है।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥