श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 1: मनु की पुत्रियों की वंशावली  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक
अत्रे: पत्‍न्यनसूया त्रीञ्जज्ञे सुयशस: सुतान् ।
दत्तं दुर्वाससं सोममात्मेशब्रह्मसम्भवान् ॥ १५ ॥
 
शब्दार्थ
अत्रे:—अत्रि मुनि की; पत्नी—पत्नी; अनसूया—अनुसूया ने; त्रीन्—तीन; जज्ञे—उत्पन्न किया; सु-यशस:—अत्यन्त प्रसिद्ध; सुतान्—पुत्रों को; दत्तम्—दत्तात्रेय; दुर्वाससम्—दुर्वासा; सोमम्—सोम (चन्द्रदेव); आत्म—परमात्मा; ईश—शिवजी; ब्रह्म—ब्रह्माजी; सम्भवान्—के अवतार ।.
 
अनुवाद
 
 अत्रि मुनि की पत्नी अनसूया ने तीन सुप्रसिद्ध पुत्र उत्पन्न किये। ये हैं—सोम, दत्तात्रेय तथा दुर्वासा, जो भगवान् ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव के अंशावतार थे। सोम ब्रह्मा के, दत्तात्रेय भगवान् विष्णु के तथा दुर्वासा शिवजी के अंश प्रतिनिधिस्वरूप थे।
 
तात्पर्य
 इस श्लोक में आत्म-ईश-ब्रह्म-सम्भवान् शब्द आये हैं। आत्म का अर्थ है परमात्मा या विष्णु; ईश का अर्थ है शिव तथा ब्रह्म का अर्थ है चतुर्मुख ब्रह्मा। अनसूया के तीनों पुत्र दत्तात्रेय, दुर्वासा तथा सोम इन तीनों देवताओं के आंशिक प्रतिनिधि थे। आत्म देवताओं या जीवात्माओं की कोटि में परिगणित नहीं होता, क्योंकि वह विष्णु है इसलिए उसे विभिन्नांश भूतानाम् कहा गया है। परमात्मा विष्णु समस्त जीवात्माओं के बीज-प्रदायक जनक हैं जिनमें ब्रह्मा तथा शिव भी सम्मिलित हैं। आत्म का एक अर्थ और भी माना जा सकता है, जो इस प्रकार है : वह तत्त्व जो प्रत्येक आत्मा में परमात्मा है या कि सबों की आत्मा है, वही दत्तात्रेय के रूप में प्रकट हुआ क्योंकि यहाँ पर अंश शब्द का प्रयोग हुआ है।

भगवद्गीता में प्रत्येक आत्मा (जीव) को श्रीभगवान् या परमात्मा का अंश रूप कहा गया है, अत: यह क्यों न मान लिया जाय कि दत्तात्रेय भी उन्हीं अंशों में से एक थे? यहाँ पर शिव तथा ब्रह्मा को भी अंश माना गया है, अत: इन सबों को सामान्य जीव क्यों न मान लिया जाय? इसका उत्तर यही है कि विष्णु तथा सामान्य जीवात्माओं के प्राकट्य निश्चित रूप से परमेश्वर के अंश हैं और इनमें से कोई भी उनके तुल्य नहीं है, किंतु इन अंशों में कई कोटियाँ हैं। वराह पुराण में अत्यंत सुन्दर ढंग से बताया गया है कि कुछ अंश स्वांश है और कुछ विभिन्नांश। विभिन्नांश जीव कहलाते हैं और स्वांश विष्णु की कोटि में आते हैं। जीव अर्थात् विभिन्नांश कोटि में भी अनेक श्रेणियाँ हैं। इसकी व्याख्या विष्णु पुराण में की गई है जहाँ यह स्पष्ट कहा गया है कि परमेश्वर के पृथक्-पृथक् अंश माया द्वारा आच्छादित हैं। ऐसे व्यक्तिगत अंश जो भगवान् की सृष्टि में कहीं भी विचरण कर सकते हों सर्वगत कहलाते हैं और भव-यातनाएँ झेलते हैं। वे विभिन्न गुणों के वशीभूत होकर अपने-अपने कर्मों के अनुसार अज्ञान के आवरण से मुक्त होते हैं। उदाहरणार्थ, सतोगुणी जन को कम कष्ट झेलने होते हैं और तमोगुणी को अधिक। किन्तु शुद्ध कृष्णभावनामृत (भक्ति) तो प्रत्येक जीवात्मा का जन्मसिद्ध अधिकार है क्योंकि वह परमेश्वर का अंश है। भगवत् चेतना भी अंशस्वरूप है और जिस अनुपात से यह चेतना भौतिक मल से रहित होती है उसी के अनुसार जीवात्माएँ भिन्न-भिन्न स्थान ग्रहण करती हैं। वेदान्त सूत्र में विभिन्न कोटि की जीवात्माओं की तुलना भिन्न-भिन्न प्रखरता वाले दीपों से की गई है। उदाहरणार्थ, कुछ बिजली के बल्ब एक हजार कैंडल शक्ति के होते हैं, तो कुछ पाँच सौ के, इन कुछ पचास के, किन्तु इन समस्त बल्बों से प्रकाश होता है। यद्यपि इन सभी बल्बों में प्रकाश विद्यमान रहता है, किन्तु इनमें प्रकाश की कोटि (प्रखरता) भिन्न-भिन्न होती है। इसी प्रकार ब्रह्म का श्रेणीकरण है। विष्णु के विभिन्न रूपों में परमेश्वर के विष्णु स्वांश प्रसार दीपों के तुल्य हैं, शिवजी भी एक दीप के तुल्य हैं, परन्तु शत-प्रति-शत प्रकाश तो श्रीकृष्ण ही हैं। विष्णु तत्त्व में ९४, शिव-तत्त्व में ८४, ब्रह्मा

में ७८ तथा अन्य जीवात्माओं में भी ब्रह्मा के ही समान ७८ प्रतिशत प्रकाश रहता है, किन्तु जब जीवात्माएँ बद्ध होती हैं, तो यह प्रकाश और भी मन्द रहता है। निस्सन्देह ब्रह्म की कई कोटियाँ हैं। इस तथ्य को कोई अस्वीकार नहीं कर सकता। अत: आत्मेश-ब्रह्मसम्भवान् शब्द सूचित करते हैं कि दत्तात्रेय विष्णु के प्रत्यक्ष अंशस्वरूप थे, जबकि दुर्वासा तथा सोम क्रमश: शिव तथा ब्रह्मा के अंश थे।

 
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥