श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 1: मनु की पुत्रियों की वंशावली  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक
शरणं तं प्रपद्येऽहं य एव जगदीश्वर: ।
प्रजामात्मसमां मह्यं प्रयच्छत्विति चिन्तयन् ॥ २० ॥
 
शब्दार्थ
शरणम्—शरण ग्रहण करके; तम्—उसकी; प्रपद्ये—समर्पण करता हूँ; अहम्—मैं; य:—जो; एव—निश्चय ही; जगत्- ईश्वर:—ब्रह्माण्ड के स्वामी; प्रजाम्—पुत्र; आत्म-समाम्—अपनी तरह का; मह्यम्—मुझको; प्रयच्छतु—प्रदान करें; इति—इस प्रकार; चिन्तयन्—सोचते हुए ।.
 
अनुवाद
 
 वे मन ही मन सोच रहे थे कि जो सम्पूर्ण जगत के स्वामी हैं और मैं जिनकी शरण में आया हूँ, वे प्रसन्न होकर मुझे अपने ही समान पुत्र प्रदान करें।
 
तात्पर्य
 ऐसा प्रतीत होता है कि अत्रि मुनि को श्रीभगवान् का विशिष्ट ज्ञान न था। निस्सन्देह, वे इस वैदिक ज्ञान से अनजान रहे होंगे कि श्रीभगवान् सर्वत्र उपस्थित हैं, जो इस जगत की सृष्टि करने वाले हैं, जिनसे प्रत्येक वस्तु उद्भूत है, जो उत्पन्न किये गये संसार का पालन करते हैं और प्रलय के बाद सारा संसार उन्हीं में विलीन हो जाता है : यतो वा इमानि भूतानि (तैत्तिरीय उपनिषद् ३.१.१)। वैदिक मंत्रों से हमें श्रीभगवान् के सम्बध में ज्ञान प्राप्त होता है, फलत: अत्रि मुनि ने श्रीभगवान् के ही समान पुत्र की की याचना करते हुए यह जाने बिना कि उनका क्या नाम है, उन पर अपना ध्यान केन्द्रित किया। भगवान् की इस प्रकार की भक्ति, जिसमें भगवान् के नाम का भी पता नहीं रहता, भगवद्गीता में वर्णित है, जिसमें भगवान् कहते हैं कि चार प्रकार के पुण्यात्मा मेरे पास मनवांछित फल माँगने आते हैं। अत्रि मुनि भगवान् के ही सदृश पुत्र चाहते थे; अत: वे शुद्ध भक्त नहीं माने जा सकते क्योंकि उनकी एक कामना थी, जो भौतिक थी। यद्यपि वे श्रीभगवान् जैसा पुत्र चाह रहे थे, किन्तु यह इच्छा भौतिक थी, क्योंकि वे श्रीभगवान् को न चाह कर उन्हीं के समान सन्तान चाह रहे थे। यदि उन्होंने श्रीभगवान् को सन्तान रूप में चाहा होता तो वे इस भौतिक इच्छा से मुक्त रहते, क्योंकि तब उन्होंने परम सत्य को चाहा होता, किन्तु उन्हीं के समान पुत्र की कामना करने से यह भौतिक इच्छा ही थी। अत: अत्रि मुनि की गिनती शुद्ध भक्तों में नहीं की जा सकती।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥