श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 1: मनु की पुत्रियों की वंशावली  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक
एको मयेह भगवान्विविधप्रधानै-
श्चित्तीकृत: प्रजननाय कथं नु यूयम् ।
अत्रागतास्तनुभृतां मनसोऽपि दूराद्
ब्रूत प्रसीदत महानिह विस्मयो मे ॥ २८ ॥
 
शब्दार्थ
एक:—एक; मया—मेरे द्वारा; इह—यहाँ; भगवान्—परम पुरुष; विविध—अनेक; प्रधानै:—साज-सामग्री द्वारा; चित्ती- कृत:—मन में स्थिर किया हुआ; प्रजननाय—सन्तान उत्पत्ति के लिए; कथम्—क्यों; नु—किन्तु; यूयम्—तुम सभी; अत्र— यहाँ; आगता:—प्रकट हुए; तनु-भृताम्—देहधारियों का; मनस:—मन; अपि—यद्यपि; दूरात्—दूर से; ब्रूत—कृपा करके बताएँ; प्रसीदत—मुझ पर कृपालु होकर; महान्—अत्यधिक; इह—यह; विस्मय:—सन्देह; मे—मेरा ।.
 
अनुवाद
 
 मैंने तो पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के ही समान पुत्र की इच्छा से उन्हीं का आवाहन किया था और मैंने उन्हीं का चिन्तन किया था। यद्यपि वे मनुष्य की मानसिक कल्पना से परे हैं, किन्तु आप तीनों यहाँ पर उपस्थित हुए हैं। कृपया मुझे बताएँ कि आप यहाँ कैसे आए हैं, क्योंकि मैं इसके विषय में अत्यधिक मोहग्रस्त हूँ।
 
तात्पर्य
 अत्रि मुनि का पूरा-पूरा विश्वास था कि श्रीभगवान् ही जगदीश्वर हैं, अत: उन्होंने एक परमेश्वर के लिए प्रार्थना की। अत: उन्हें विस्मय हो रहा था कि तीनों किस प्रकार प्रकट हुए हैं?
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥