श्रीमद् भागवतम
 
हिंदी में पढ़े और सुनें
भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 1: मनु की पुत्रियों की वंशावली  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक
देवा ऊचु:
यथा कृतस्ते सङ्कल्पो भाव्यं तेनैव नान्यथा ।
सत्सङ्कल्पस्य ते ब्रह्मन् यद्वै ध्यायति ते वयम् ॥ ३० ॥
 
शब्दार्थ
देवा: ऊचु:—देवताओं ने उत्तर दिया; यथा—जैसा; कृत:—किया हुआ; ते—तुम्हारे द्वारा; सङ्कल्प:—निश्चय, संकल्प; भाव्यम्—होना चाहिए; तेन एव—उससे; न अन्यथा—और कुछ नहीं, विपरीत नहीं; सत्-सङ्कल्पस्य—जिसका निश्चय डिगता नहीं; ते—तुम्हारा; ब्रह्मन्—हे ब्राह्मण; यत्—जो; वै—निश्चय ही; ध्यायति—ध्यान धरते हुए; ते—वे सभी; वयम्—हम हैं ।.
 
अनुवाद
 
 तीनों देवताओं ने अत्रि मुनि से कहा : हे ब्राह्मण, तुम अपने संकल्प में पूर्ण हो, अत: तुमने जो कुछ निश्चित कर रखा है, वही होगा, उससे विपरीत नहीं होगा। हम सब वे ही पुरुष हैं जिनका तुमने ध्यान किया है और इसीलिए हम सब तुम्हारे पास आये हैं।
 
तात्पर्य
 अत्रि मुनि को जगदीश्वर या भगवान् के किसी रूप विशेष का कोई स्पष्ट ज्ञान न था। उन्होंने तो अनायास ही श्रीभगवान् का चिन्तन किया था। महाविष्णु, जिनके श्वास से करोड़ों ब्रह्माण्डों का उद्भव और फिर उन्हीं में लय होता है, जगदीश्वर माने जा सकते हैं। गर्भोदकशायी विष्णु भी, जिनकी नाभि से कमल प्रकट हुआ जो ब्रह्मा का जन्मस्थल है, जगदीश्वर माने जा सकते हैं। इसी प्रकार समस्त जीवात्माओं के परम-आत्मा स्वरूप क्षीरोदकशायी विष्णु भी जगदीश्वर कहे जा सकते हैं। फिर क्षीरोदकशायी विष्णु की आज्ञा से इस ब्रह्माण्ड में विष्णु रूपों को, यथा ब्रह्मा तथा शिव को भी जगदीश्वर माना जा सकता है।

विष्णु जगदीश्वर हैं क्योंकि वे जगत्पालक हैं। इसी तरह ब्रह्मा विभिन्न लोकों तथा जीवों की सृष्टि करने के कारण जगदीश्वर हैं। अथवा शिवजी, जो अन्त में इस ब्रह्माण्ड का संहार करते हैं, जगदीश्वर माने जा सकते हैं। अत: अत्रि द्वारा किसी विशेष रूप का उल्लेख न किये जाने से उनके चाहने पर ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव—तीनों—उनके समक्ष प्रकट हुए और कहा, “चूँकि तुमने जगत के स्वामी श्रीभगवान् के ही समान पुत्र प्राप्त करने के विषय में चिन्तन किया था, इसलिए तुम्हारा संकल्प पूरा होगा।” दूसरे शब्दों में, मनुष्य की भक्ति की शक्ति के अनुसार ही उसका संकल्प पूरा होता है। जैसाकि भगवद्गीता (९.२५) में कहा गया है—यान्ति देवव्रता देवान् पितृन् यान्ति पितृव्रता:। जो जिस विशेष देवता पर आसक्त है, वह उसी के धाम को जाता है। यदि कोई पितरों पर आसक्ति रखता है, तो वह पितृलोक जाता है; इसी प्रकार यदि पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् कृष्ण पर किसी की आसक्ति है, तो वह भगवान् कृष्ण के धाम जाता है। अत्रि मुनि को जगदीश्वर का कोई स्पष्ट ज्ञान न था अत: उनके समक्ष तीनों प्रमुख देव उपस्थित हुए, जो जगत के तीनों गुणविभागों के स्वामी हैं। अब पुत्र के लिए संकल्प शक्ति के अनुसार ही उनकी इच्छा भगवत् कृपा से पूरी होनी है।

 
शेयर करें
       
 
  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
  Disclaimer: copyrights reserved to BBT India and BBT Intl.

 
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥