श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 1: मनु की पुत्रियों की वंशावली  »  श्लोक 49-52
 
 
श्लोक
पितृभ्य एकां युक्तेभ्यो भवायैकां भवच्छिदे ।
श्रद्धा मैत्री दया शान्तिस्तुष्टि: पुष्टि: क्रियोन्नति: ॥ ४९ ॥
बुद्धिर्मेधा तितिक्षा ह्रीर्मूर्तिर्धर्मस्य पत्नय: ।
श्रद्धासूत शुभं मैत्री प्रसादमभयं दया ॥ ५० ॥
शान्ति: सुखं मुदं तुष्टि: स्मयं पुष्टिरसूयत ।
योगं क्रियोन्नतिर्दर्पमर्थं बुद्धिरसूयत ॥ ५१ ॥
मेधा स्मृतिं तितिक्षा तु क्षेमं ह्री: प्रश्रयं सुतम् ।
मूर्ति: सर्वगुणोत्पत्तिर्नरनारायणावृषी ॥ ५२ ॥
 
शब्दार्थ
पितृभ्य:—पितृगण को; एकाम्—एक पुत्री; युक्तेभ्य:—समस्त, संयुक्त; भवाय—शिवजी को; एकाम्—एक पुत्री; भव छिदे—भौतिक बन्धन से छुड़ाने वाले; श्रद्धा, मैत्री, दया, शान्ति:, तुष्टि:, पुष्टि:, क्रिया, उन्नति:, बुद्धि:, मेधा, तितिक्षा, ह्री:, मूर्ति:—ये दक्ष की तेरह कन्याओं के नाम हैं; धर्मस्य—धर्म की; पत्नय:—पत्नियाँ; श्रद्धा—श्रद्धा ने; असूत—जन्म दिया; शुभम्—शुभ; मैत्री—मैत्री; प्रसादम्—प्रसाद; अभयम्—अभय; दया—दया; शान्ति:—शान्ति; सुखम्—सुख; मुदम्—मुद; तुष्टि:—तुष्टि; स्मयम्—स्मय; पुष्टि:—पुष्टि; असूयत—जन्म दिया; योगम्—योग; क्रिया—क्रिया; उन्नति:—उन्नति; दर्पम्—दर्प; अर्थम्—अर्थ; बुद्धि:—बुद्धि; असूयत—उत्पन्न किया; मेधा—मेधा; स्मृतिम्—स्मृति; तितिक्षा—तितिक्षा; तु—भी; क्षेमम्— क्षेम; ह्री:—ह्नी; प्रश्रयम्—प्रश्रय; सुतम्—पुत्र; मूर्ति:—मूर्ति; सर्व-गुण—समस्त अच्छे गुणों का; उत्पत्ति:—आगार; नर नारायणौ—नर तथा नारायण; ऋषी—दो ऋषि ।.
 
अनुवाद
 
 शेष दो कन्याओं में से एक पितृलोक को दान दे दी गई, जहाँ वह प्रेमपूर्वक रह रही है और दूसरी कन्या भवबंधन से समस्त पापियों के उद्धारक शिवजी को दी गई। दक्ष ने धर्म को जिन तेरह कन्याओं को दिया उनके नाम थे : श्रद्धा, मैत्री, दया, शान्ति, तुष्टि, पुष्टि, क्रिया, उन्नति, बुद्धि, मेधा, तितिक्षा, ह्री तथा मूर्ति। इन तेरहों ने पुत्रों को जन्म दिया, जो इस प्रकार हैं—श्रद्धा ने शुभ, मैत्री ने प्रसाद, दया ने अभय, शान्ति ने सुख, तुष्टि ने मुद, पुष्टि ने स्मय, क्रिया ने योग, उन्नति ने दर्प, बुद्धि ने अर्थ, मेधा ने स्मृति, तितिक्षा ने क्षेम तथा ह्नी ने प्रश्रय को जन्म दिया। समस्त गुणों की खान मूर्ति ने नर-नारायण को जन्म दिया, जो पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं।
 
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥