श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 1: मनु की पुत्रियों की वंशावली  »  श्लोक 57

 
श्लोक
सोऽयं स्थितिव्यतिकरोपशमाय सृष्टान्
सत्त्वेन न: सुरगणाननुमेयतत्त्व: ।
द‍ृश्याददभ्रकरुणेन विलोकनेन
यच्छ्रीनिकेतममलं क्षिपतारविन्दम् ॥ ५७ ॥
 
शब्दार्थ
स:—वह; अयम्—यह (भगवान्); स्थिति—उत्पन्न जगत का; व्यतिकर—आपत्तियाँ; उपशमाय—शमन हेतु; सृष्टान्—सर्जित; सत्त्वेन—सत्तोगुण से; न:—हम; सुर-गणान्—देवताओं को; अनुमेय-तत्त्व:—वेदों द्वारा ज्ञेय; दृश्यात्—दृष्टिपात से; अदभ्र- करुणेन—दयालु, करुणा से युक्त; विलोकनेन—चितवन से; यत्—जो; श्री-निकेतम्—धन की देवी का घर; अमलम्— निर्मल; क्षिपत—से बढक़र; अरविन्दम्—कमल ।.
 
अनुवाद
 
 वे पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्, जो वास्तविक रूप से प्रामाणिक वैदिक साहित्य द्वारा जाने जाते हैं और जिन्होंने सृष्ट जगत की समस्त विपत्तियों को विनष्ट करने के लिए शान्ति तथा समृद्धि का सृजन किया है, हम देवताओं पर कृपापूर्ण दृष्टिपात करें। उनकी कृपापूर्ण चितवन लक्ष्मी के आसन निर्मल कमल की शोभा को मात करने वाली है।
 
तात्पर्य
 दृश्य जगत के मूल पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् भौतिक प्रकृति की विचित्र क्रियाओं से आच्छादित हैं जिस प्रकार बाह्य आकाश अथवा सूर्य और चन्द्रमा का प्रकाश बादलों या रजकणों से आच्छादित हो जाता है। दृश्य जगत के मूल को ढूँढ पाना दुष्कर है, अत: भौतिक विज्ञानी इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि समस्त जगत का परम कारण प्रकृति है। किन्तु शास्त्रों अथवा भगवद्गीता
तथा अन्य प्रामाणिक वैदिक धर्मग्रन्थों से हम यह जानते हैं कि इस विचित्र दृश्य जगत के पीछे श्रीभगवान् का हाथ है और दृश्य जगत के नियमों को बनाये रखने तथा सतोगुणमय व्यक्तियों के नेत्रों में दिखाई पडऩे के लिए भगवान् अवतरित होते हैं। वे इस दृश्य जगत की सृष्टि और लय के कारण हैं। इसीलिए देवतागण उनकी दयादृष्टि चाहते थे जिससे उन्हें आशीर्वाद मिल सके।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥