श्रीमद् भागवतम
 
हिंदी में पढ़े और सुनें
भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 1: मनु की पुत्रियों की वंशावली  »  श्लोक 60
 
 
श्लोक
स्वाहाभिमानिनश्चाग्नेरात्मजांस्त्रीनजीजनत् ।
पावकं पवमानं च शुचिं च हुतभोजनम् ॥ ६० ॥
 
शब्दार्थ
स्वाहा—अग्नि की पत्नी, स्वाहा; अभिमानिन:—अग्नि का मुख्य विग्रह; च—तथा; अग्ने:—अग्नि से; आत्मजान्—पुत्रों को; त्रीन्—तीन; अजीजनत्—उत्पन्न किया; पावकम्—पावक; पवमानम् च—तथा पवमान; शुचिम् च—तथा शुचि; हुत भोजनम्—यज्ञ की आहुति खाकर ।.
 
अनुवाद
 
 अग्निदेव की पत्नी स्वाहा से तीन संताने उत्पन्न हुई जिनके नाम पावक, पवमान तथा शुचि हैं, जो यज्ञ की अग्नि में डाली गई आहुतियों को खाने वाले हैं।
 
तात्पर्य
 धर्म की तेरह पत्नियों का जो सभी दक्ष की कन्याएँ थीं, उनका वर्णन कर लेने के बाद मैत्रेय दक्ष की चौदहवीं कन्या स्वाहा तथा उसके तीन पुत्रों का वर्णन कर रहे हैं। यज्ञ की अग्नि में डाली गई आहुतियाँ देवों के निमित्त होती हैं और देवताओं की ओर से अग्नि तथा स्वाहा के तीनों पुत्र पावक, पवमान तथा शुचि आहुतियाँ स्वीकार करते हैं।
 
शेयर करें
       
 
  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
  Disclaimer: copyrights reserved to BBT India and BBT Intl.

 
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥