श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 1: मनु की पुत्रियों की वंशावली  »  श्लोक 61

 
श्लोक
तेभ्योऽग्नय: समभवन्चत्वारिंशच्च पञ्च च ।
त एवैकोनपञ्चाशत्साकं पितृपितामहै: ॥ ६१ ॥
 
शब्दार्थ
तेभ्य:—उनसे; अग्नय:—अग्निदेव; समभवन्—उत्पन्न हुए; चत्वारिंशत्—चालीस; च—तथा; पञ्च—पाँच; च—तथा; ते—वे; एव—निश्चय ही; एकोन-पञ्चाशत्—उञ्चास; साकम्—साथ में; पितृ-पितामहै:—पिता तथा पितामह के साथ ।.
 
अनुवाद
 
 इन तीनों पुत्रों से अन्य पैंतालीस सन्तानें उत्पन्न हुईं और वे भी अग्निदेव हैं। अत: अग्निदेवों की कुल संख्या उनके पिताओं तथा पितामह को मिलाकर उञ्चास है।
 
तात्पर्य
 पितामह अग्नि है तथा पुत्र पावक, पवमान एवं शुचि हैं। इन चारों को तथा
पैंतालीस पौत्रों को मिलाकर कुल उञ्चास भिन्न-भिन्न अग्निदेव हैं।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥