श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 10: यक्षों के साथ ध्रुव महाराज का युद्ध  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  4.10.15 
नदत्सु यातुधानेषु जयकाशिष्वथो मृधे ।
उदतिष्ठद्रथस्तस्य नीहारादिव भास्कर: ॥ १५ ॥
 
शब्दार्थ
नदत्सु—निनाद करते अथवा गरजते हुए; यातुधानेषु—प्रेत रूप यक्ष; जय-काशिषु—विजय घोष करते हुए; अथो—तब; मृधे—युद्ध में; उदतिष्ठत्—प्रकट हुआ; रथ:—रथ; तस्य—ध्रुव महाराज का; नीहारात्—कुहरे; इव—सदृश; भास्कर:—सूर्य ।.
 
अनुवाद
 
 क्षणिक विजय जैसी स्थिति देखकर यक्षों ने घोषित कर दिया कि उन्होंने ध्रुव महाराज पर विजय प्राप्त कर ली है। किन्तु तभी ध्रुव का रथ एकाएक प्रकट हुआ, जैसे कुहरे को भेदकर सूर्य सहसा प्रकट हो जाता है।
 
तात्पर्य
 यहाँ पर ध्रुव महाराज की उपमा सूर्य से और यक्षों के विशाल दल की तुलना कुहरे से दी गई है। सूर्य की तुलना में कुहरा नगण्य होता है। भले ही सूर्य कभी-कभी कुहरे से ढका दिखाई दे, किन्तु वस्तुत: सूर्य को किसी प्रकार ढका नहीं जा सकता। हमारे नेत्र भले ही बादलों से ढक जाएं किन्तु सूर्य कभी नहीं ढका जा सकता। सूर्य के साथ इस प्रकार की उपमा से ध्रुव महाराज की सार्वभौम महानता की पुष्टि होती है।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥