श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 10: यक्षों के साथ ध्रुव महाराज का युद्ध  »  श्लोक 22

 
श्लोक
इति ब्रुवंश्चित्ररथ: स्वसारथिं
यत्त: परेषां प्रतियोगशङ्कित: ।
शुश्राव शब्दं जलधेरिवेरितं
नभस्वतो दिक्षु रजोऽन्वद‍ृश्यत ॥ २२ ॥
 
शब्दार्थ
इति—इस प्रकार; ब्रुवन्—बातें करते; चित्र-रथ:—ध्रुव महाराज, जिनका रथ अत्यन्त सुन्दर था; स्व-सारथिम्—अपने सारथी से; यत्त:—सावधान; परेषाम्—अपने शत्रुओं से; प्रतियोग—जवाबी हमला; शङ्कित:—सशंकित; शुश्राव—सुना; शब्दम्— शब्द; जलधे:—समुद्र से; इव—मानो; ईरितम्—प्रतिध्वनित; नभस्वत:—वायु के कारण; दिक्षु—सभी दिशाओं में; रज:— धूल; अनु—तब; अदृश्यत—दिखाई पड़ी ।.
 
अनुवाद
 
 जब ध्रुव महाराज अपने मायावी शत्रुओं से सशंकित होकर अपने सारथी से बातें कर रहे थे तो उन्हें प्रचण्ड ध्वनि सुनाई पड़ी, मानो सम्पूर्ण समुद्र उमड़ आया हो। उन्होंने देखा कि आकाश से उन पर चारों ओर से धूल भरी आँधी आ रही है।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥