श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 10: यक्षों के साथ ध्रुव महाराज का युद्ध  »  श्लोक 8

 
श्लोक
स तानापततो वीर उग्रधन्वा महारथ: ।
एकैकं युगपत्सर्वानहन् बाणैस्त्रिभिस्त्रिभि: ॥ ८ ॥
 
शब्दार्थ
स:—वह (ध्रुव महाराज); तान्—उन सबों को; आपतत:—अपने ऊपर टूटते हुए; वीर:—वीर; उग्र-धन्वा—शक्तिशाली धनुर्धर; महा-रथ:—जो अनेक रथों से लड़ सके; एक-एकम्—एक-एक करके; युगपत्—एकसाथ, एक समय; सर्वान्—उन सबों को; अहन्—मार डाला; बाणै:—बाणों से; त्रिभि: त्रिभि:—तीन तीन करके ।.
 
अनुवाद
 
 ध्रुव महाराज, जो महारथी तथा निश्चय ही महान् धनुर्धर भी थे, तुरन्त ही एकसाथ तीन-तीन बाण छोड़ करके उन्हें मारने लगे।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥