श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 11: युद्ध बन्द करने के लिए  »  श्लोक 10

 
श्लोक
नायं मार्गो हि साधूनां हृषीकेशानुवर्तिनाम् ।
यदात्मानं पराग्गृह्य पशुवद्भूतवैशसम् ॥ १० ॥
 
शब्दार्थ
न—नहीं; अयम्—यह; मार्ग:—रास्ता; हि—निश्चय ही; साधूनाम्—भले पुरुषों का; हृषीकेश—भगवान् के; अनुवर्तिनाम्— पथ का अनुगमन करते; यत्—जो; आत्मानम्—स्वयं; पराक्—शरीर; गृह्य—मानकर; पशु-वत्—पशुओं के तुल्य; भूत— जीवात्माओं का; वैशसम्—वध ।.
 
अनुवाद
 
 मनुष्य को चाहिए कि वह शरीर को आत्मा न माने और इस प्रकार पशुओं की भाँति अन्यों का वध न करे। भगवान् की भक्ति के पथ का अनुसरण करनेवाले साधु पुरुषों ने इसे विशेष रूप से वर्जित किया है।
 
तात्पर्य
 साधूनां हृषीकेशानुवर्तिनाम् शब्द अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं। आखिर साधु पुरुष कौन है? साधु पुरुष वह है, जो भगवान् हृषीकेश की सेवा के पथ का अनुसरण करता है। नारद-पञ्चरात्र में कहा गया है कि हृषीकेण हृषीकेशसेवनं भक्तिरुच्यते—अपनी इन्द्रियों द्वारा भगवान् की समुचित सेवा करने की विधि भक्ति कहलाती है। अत: जो व्यक्ति पहले से भगवान् की भक्ति में लगा है, वह इन्द्रिय-तृप्ति में आखिर
क्यों प्रवृत्त हो? यहाँ पर मनु ने ध्रुव महाराज को उपदेश दिया है कि वे भगवान् के शुद्ध दास हैं, तो फिर वे वृथा पशुओं की तरह देहात्मबुद्धि में क्यों प्रवृत्त हो रहे हैं? एक पशु सोचता है कि दूसरा पशु उसका आहार है, अत: देहात्मबुद्धिवश एक पशु दूसरे पर आक्रमण करता है। मनुष्य को, और विशेष रूप से भक्त को ऐसा नहीं करना चाहिए। साधु सदृश किसी भक्त को पशुओं का वृथा वध नहीं करना चाहिए।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥