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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 11: युद्ध बन्द करने के लिए  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  4.11.30 
त्वं प्रत्यगात्मनि तदा भगवत्यनन्त
आनन्दमात्र उपपन्नसमस्तशक्तौ ।
भक्तिं विधाय परमां शनकैरविद्या-
ग्रन्थिं विभेत्स्यसि ममाहमिति प्ररूढम् ॥ ३० ॥
 
शब्दार्थ
त्वम्—तुम; प्रत्यक्-आत्मनि—परमात्मा को; तदा—उस समय; भगवति—भगवान् को; अनन्ते—असीम को; आनन्द-मात्रे— समस्त आनन्द का आगार; उपपन्न—से युक्त; समस्त—सर्व; शक्तौ—शक्तियाँ; भक्तिम्—भक्ति; विधाय—करके; परमाम्— परम; शनकै:—तुरन्त; अविद्या—माया की; ग्रन्थिम्—गाँठ; विभेत्स्यसि—नष्ट कर दोगे, काट दोगे; मम—मेरा; अहम्—मैं; इति—इस प्रकार; प्ररूढम्—दृढ़तापूर्वक स्थित, सुदृढ़ ।.
 
अनुवाद
 
 इस प्रकार अपनी सहज स्थिति प्राप्त करके तथा समस्त आनन्द के सर्व शक्तिसम्पन्न आगार तथा प्रत्येक जीवात्मा में परमात्मा में स्थित परमेश्वर की सेवा करके तुम तुरन्त ही “मैं” तथा ‘मेरा’ के मायाजनित बोध को भूल जाओगे।
 
तात्पर्य
 ध्रुव महाराज पहले से मुक्त पुरुष थे, क्योंकि पाँच वर्ष की ही अवस्था में उन्हें भगवान् का दर्शन हो चुका था। मुक्त होने के बावजूद भी वे इस समय माया के मोह से ग्रस्त थे, क्योंकि अपने भाई उत्तम को देहात्म-बुद्धि से देख रहे थे। सारा भौतिक जगत ‘मैं’ तथा ‘मेरा’ को आधार मानकर कार्यशील है। भौतिक जगत के प्रति आकर्षण का मूल कारण यही है। यदि मनुष्य ‘मैं’ तथा ‘मेरा’ के मायामोह से आकृष्ट हो जाता है, तो वह इसी जगत में विभिन्न सम्मानित अथवा घृणित पदों पर रहता रहेगा। भगवत्कृपा से मनु तथा ऋषियों ने ध्रुव महाराज को स्मरण दिलाया कि वे इस ‘मैं-मेरे’ के भौतिक बोध में न रहें। मात्र भगवद्भक्ति से उनका यह मोह सुगमता से दूर हो सकता है।
 
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