श्रीमद् भागवतम
शब्द आकार

भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 11: युद्ध बन्द करने के लिए  »  श्लोक 32

 
श्लोक
येनोपसृष्टात्पुरुषाल्लोक उद्विजते भृशम् ।
न बुधस्तद्वशं गच्छेदिच्छन्नभयमात्मन: ॥ ३२ ॥
 
शब्दार्थ
येन—जिससे; उपसृष्टात्—वशीभूत होकर; पुरुषात्—पुरुष द्वारा; लोक:—प्रत्येक व्यक्ति; उद्विजते—भयभीत होता है; भृशम्—अत्यधिक; न—कभी नहीं; बुध:—बुद्धिमान पुरुष; तत्—क्रोध के; वशम्—वश में; गच्छेत्—जाए; इच्छन्—चाहते हुए; अभयम्—निर्भीकता, मुक्ति; आत्मन:—स्व की ।.
 
अनुवाद
 
 जो व्यक्ति इस भौतिक जगत से मुक्ति चाहता है उसे चाहिए कि वह क्रोध के वशीभूत न हो, क्योंकि क्रोध से मोहग्रस्त होने पर वह अन्य सबों के लिए भय का कारण बन जाता है।
 
तात्पर्य
 भक्त या साधु पुरुष को न तो अन्यों के लिए भय का कारण बनना चाहिए और न किसी को चाहिए कि उसके भय का कारण बने। यदि दूसरे से शत्रुता का व्यवहार नहीं किया जाता तो फिर कोई किसी का शत्रु क्यों बनेगा? किन्तु जीसस क्राइस्ट का उदाहरण हमारे
समक्ष है जिनके शत्रुओं ने उन्हें क्रूस (सूली) चढ़ा दिया। असुर सदैव विद्यमान रहते हैं और वे साधु पुरुषों में भी दोष निकालते रहते हैं, किन्तु साधु पुरुष कभी रुष्ट नहीं होते, भले ही उन्हें कितना ही क्यों न उकसाया जाये।
____________________________
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥