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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 12: ध्रुव महाराज का भगवान् के पास जाना  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  4.12.14 
एवं बहुसवं कालं महात्माविचलेन्द्रिय: ।
त्रिवर्गौपयिकं नीत्वा पुत्रायादान्नृपासनम् ॥ १४ ॥
 
शब्दार्थ
एवम्—इस प्रकार; बहु—अनेक; सवम्—वर्ष; कालम्—समय; महा-आत्मा—महान् पुरुष; अविचल-इन्द्रिय:—इन्द्रियों के चलायमान हुए बिना; त्रि-वर्ग—तीन प्रकार के सांसारिक कार्य; औपयिकम्—करने के अनुकूल; नीत्वा—बिता करके; पुत्राय—अपने पुत्र को; अदात्—प्रदान कर दिया; नृप-आसनम्—राज-सिंहासन ।.
 
अनुवाद
 
 इस प्रकार आत्मसंयमी महापुरुष ध्रुव महाराज ने तीन प्रकार के सांसारिक कार्यों—धर्म, अर्थ, तथा काम—को ठीक तरह से अनेकानेक वर्षों तक सम्पन्न किया। तत्पश्चात् उन्होंने अपने पुत्र को राजसिंहासन सौंप दिया।
 
तात्पर्य
 धर्म का पालन करने से भौतिक जीवन की पूर्णता प्राप्त होती है। इससे स्वत: आर्थिक विकास होता है और तब समस्त भौतिक इच्छाओं को पूरा करने में कोई कठिनाई नहीं होती। चूँकि राजा के रूप में ध्रुव महाराज को अपनी स्थिति बनाये रखना था, अन्यथा प्रजा पर शासन करना सम्भव न था अत: उन्होंने इसे अच्छी तरह निभाया। जब उन्होंने देखा कि उनका पुत्र बड़ा हो गया है और राजसिंहासन का भार ग्रहण कर सकता है, तो वे तुरन्त ही अपना भार उतार कर सांसारिक व्यस्तताओं से विरक्त हो गये।

यहाँ पर प्रयुक्त एक शब्द अविचलेन्द्रिय अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है, जिसका अर्थ है कि उनकी इन्द्रियाँ विचलित नहीं हुईं, न ही उनकी इन्द्रियशक्ति घटी, यद्यपि आयु की दृष्टि से वे अत्यन्त वृद्ध हो चुके थे। चूँकि उन्होंने छत्तीस हजार वर्षों तक राज्य किया था, अत: निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि वे अत्यन्त वृद्ध हो चुके थे, किन्तु उनकी इन्द्रियाँ तरुण थीं, तो भी वे इन्द्रियतृप्ति में रुचि नहीं रखते थे। दूसरे शब्दों में, वे आत्म-संयमी बने रहे। उन्होंने अपने कर्तव्य सही ढंग से सांसारिक रीति से पूरे किए। यही महान् भक्तों की व्यवहार-प्रणाली है। भगवान् चैतन्य के एक महान् शिष्य श्रील रघुनाथदास गोस्वामी एक धनी व्यक्ति के पुत्र थे। उन्हें सांसारिक सुख भोगने की तनिक भी इच्छा न थी, किन्तु जब उन्हें सूबे का प्रबन्ध करने का भार सौंपा गया तो वे उसे सुचारु रूप से करते रहे। श्रील गौरसुन्दर ने उन्हें सलाह दी कि अन्दर से तुम अपने आपको तथा अपने मन को पूर्ण रूप से पृथक् रखो, किन्तु बाहर से सारे कार्य उसी तरह करते रहो जिस रूप में वे होने चाहिए। ऐसी दिव्य स्थिति केवल भक्त ही प्राप्त कर सकते हैं, जैसाकि भगवद्गीता में कहा गया है—जहाँ योगी अपनी इन्द्रियों को बलपूर्वक वश में करना चाहते हैं, वहीं भक्तजन पूर्ण इन्द्रिय-शक्तियों से युक्त होने पर भी उनका प्रयोग नहीं करते, क्योंकि वे उन्हें उच्चतर दिव्य कर्मों में लगाते हैं।

 
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