श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 12: ध्रुव महाराज का भगवान् के पास जाना  »  श्लोक 20

 
श्लोक
तत्रानु देवप्रवरौ चतुर्भुजौ
श्यामौ किशोरावरुणाम्बुजेक्षणौ ।
स्थिताववष्टभ्य गदां सुवाससौ
किरीटहाराङ्गदचारुकुण्डलौ ॥ २० ॥
 
शब्दार्थ
तत्र—वहाँ; अनु—तब; देव-प्रवरौ—दो अत्यन्त सुन्दर देवता; चतु:-भुजौ—चार भुजाओं वाले; श्यामौ—श्याम वर्ण के; किशोरौ—अत्यन्त तरुण; अरुण—लाल; अम्बुज—कमल; ईक्षणौ—आँखों वाले; स्थितौ—स्थित; अवष्टभ्य—लिये; गदाम्—गदा; सुवाससौ—सुन्दर वस्त्रों से युक्त; किरीट—मुकुट; हार—माला; अङ्गद—बिजावट; चारु—सुन्दर; कुण्डलौ— कान के कुण्डल सहित ।.
 
अनुवाद
 
 ध्रुव महाराज ने विमान में भगवान् विष्णु के दो अत्यन्त सुन्दर पार्षदों को देखा। उनके चार भुजाएँ थीं और श्याम वर्ण की शारीरिक कान्ति थी, वे अत्यन्त तरुण थे और उनके नेत्र लाल कमल-पुष्पों के समान थे। वे हाथों में गदा धारण किये थे और उनकी वेशभूषा अत्यन्त आकर्षक थी। वे मुकुट धारण किये थे और हारों, बाजूबन्दों तथा कुण्डलों से सुशोभित थे।
 
तात्पर्य
 विष्णुलोक के वासी भगवान् विष्णु के ही समान शारीरिक लक्षण वाले होते हैं। वे भी गदा, शंख, कमल तथा चक्र धारण करते हैं। इस श्लोक में स्पष्ट कहा गया है कि उनके चार हाथ थे
और वे सुन्दर वस्त्रों से आभूषित थे। उनके शारीरिक अलंकरण का वर्णन विष्णु से मेल खाता था। अत: विमान द्वारा जो दो असामान्य व्यक्ति आये वे विष्णुलोक से सीधे आये थे।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥