श्रीमद् भागवतम
शब्द आकार

भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 12: ध्रुव महाराज का भगवान् के पास जाना  »  श्लोक 26

 
श्लोक
अनास्थितं ते पितृभिरन्यैरप्यङ्ग कर्हिचित् ।
आतिष्ठ जगतां वन्द्यं तद्विष्णो: परमं पदम् ॥ २६ ॥
 
शब्दार्थ
अनास्थितम्—कभी भी प्राप्त नहीं हुआ; ते—तुम्हारे; पितृभि:—पूर्वजों द्वारा; अन्यै:—अन्यों के द्वारा; अपि—भी; अङ्ग—हे ध्रुव; कर्हिचित्—कभी भी; आतिष्ठ—आकर रहिये; जगताम्—ब्रह्माण्ड के वासियों द्वारा; वन्द्यम्—पूज्य; तत्—वह; विष्णो:—विष्णु का; परमम्—परम; पदम्—पद, स्थान ।.
 
अनुवाद
 
 हे राजा ध्रुव, आज तक न तो आपके पूर्वजों ने, न अन्य किसी ने ऐसा दिव्य लोक प्राप्त किया है। यह विष्णुलोक, जहाँ विष्णु निवास करते हैं, सबों से ऊपर है। यह अन्य सभी इस ब्रह्माण्डों के निवासियों द्वारा पूजित है। आप हमारे साथ आयें और वहाँ शाश्वत वास करें।
 
तात्पर्य
 जब ध्रुव महाराज तपस्या करने गये थे तो वे ऐसा पद प्राप्त करने के लिए दृढ़प्रतिज्ञ थे, जिसकी कल्पना उनके पूर्वजों को स्वप्न में भी न हुई हो। उनके पिता उत्तानपाद थे, पितामह मनु और प्रपितामह ब्रह्मा थे। अत: वे ब्रह्मा द्वारा प्राप्य पद से भी बड़ा पद चाह रहे थे और उन्होंने नारद से ऐसा पद प्राप्त करने की सुविधा मांगी थी। अत: विष्णु के पार्षदों ने स्मरण दिलाया कि विष्णु जिस लोक में वास करते हैं उसे न तो उनके पूर्वज और न ब्रह्माण्ड का कोई भी वासी प्राप्त कर सका है। इसका एकमात्र कारण यही है कि इस जगत में प्रत्येक व्यक्ति या तो कर्मी या ज्ञानी अथवा योगी ही हैं, शुद्ध भक्त तो शायद ही कोई होगा। विष्णुलोक नामक दिव्यलोक तो विशेष रूप से भक्तों के लिए है; ज्ञानियों, कर्मियों या योगियों के लिए नहीं। बड़े-बड़े ऋषि अथवा देवता ब्रह्मलोक तक नहीं पहुँच पाते हैं और जैसाकि भगवद्गीता में उल्लेख है ब्रह्मलोक स्थायी वास नहीं है। ब्रह्मा का जीवनकाल इतना दीर्घ है कि उनके एक दिन का भी अनुमान लगा पाना कठिन है, तो भी ब्रह्मा भी मरते हैं और उसी तरह उनके लोक के वासी भी। भगवद्गीता (८.१६) में कहा गया है—आब्रह्म भुवनाल्लोका:
पुनरावर्तिनोऽर्जुन—जो लोग विष्णुलोक को जाते हैं, उनके अतिरिक्त सभी जीवन के चार नियमों— जन्म, मृत्यु, जरा तथा रोग—द्वारा अनुशासित होते हैं। गीता में (१५.६) भगवान् का कथन है— यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम् परमं मम—वह लोक, जहाँ एक बार जाकर लौटना नहीं होता वह मेरा परम धाम है। ध्रुव महाराज को स्मरण कराया गया, “आप हमारे साथ उस लोक को जा रहे हैं जहाँ से लौटकर कोई फिर इस लोक में नहीं आता।” भौतिक विज्ञानी चन्द्रमा तथा अन्य ग्रहों तक जाने का प्रयास कर रहे हैं, किन्तु वे सर्वोच्च ग्रह, ब्रह्मलोक तक जाने की कल्पना नहीं कर सकते, क्योंकि वह उनकी कल्पना से परे है। भौतिक गणना से यदि कोई प्रकाश की गति से यात्रा करे तो सर्वोच्च ग्रह तक पहुँचने में चालीस हजार प्रकाशवर्ष लगेंगे। यांत्रिक विधियों से ब्रह्माण्ड के सर्वोच्च ग्रह तक पहुँचना दुष्कर है, किन्तु भक्तियोग द्वारा, जिसे महाराज ध्रुव ने अपनाया था, कोई भी मनुष्य इस ब्रह्माण्ड के अन्य किसी ग्रह तक ही नहीं, वरन् इस ब्रह्माण्ड से परे विष्णुलोक को जा सकता है। हमने इसकी रूपरेखा अपनी पुस्तिका अन्य ग्रहों की सुगम यात्रा में प्रस्तुत की है।
____________________________
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥