श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 12: ध्रुव महाराज का भगवान् के पास जाना  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  4.12.28 
मैत्रेय उवाच
निशम्य वैकुण्ठनियोज्यमुख्ययो-
र्मधुच्युतं वाचमुरुक्रमप्रिय: ।
कृताभिषेक: कृतनित्यमङ्गलो
मुनीन् प्रणम्याशिषमभ्यवादयत् ॥ २८ ॥
 
शब्दार्थ
मैत्रेय: उवाच—मैत्रेय ने कहा; निशम्य—सुनकर; वैकुण्ठ—भगवान् के; नियोज्य—पार्षद; मुख्ययो:—प्रधान के; मधु- च्युतम्—मधु ढालनेवाले, अमृतमय; वाचम्—वचन; उरुक्रम-प्रिय:—भगवान् के प्रिय, ध्रुव महाराज; कृत-अभिषेक:—स्नान करके; कृत—निवृत्त; नित्य-मङ्गल:—अपने नैत्यिक कर्म; मुनीन्—मुनियों को; प्रणम्य—नमस्कार करके; आशिषम्— आशीर्वाद; अभ्यवादयत्—स्वीकार किया ।.
 
अनुवाद
 
 महर्षि मैत्रेय ने आगे कहा : ध्रुव महाराज भगवान् के अत्यन्त प्रिय थे। जब उन्होंने वैकुण्ठलोक वासी भगवान् के मुख्य पार्षदों की मधुरवाणी सुनी तो उन्होंने तुरन्त स्नान किया, अपने को उपयुक्त आभूषणों से अलंकृत किया और अपने नित्य आध्यात्मिक कर्म सम्पन्न किए। तत्पश्चात् उन्होंने वहाँ पर उपस्थित ऋषियों को प्रणाम किया और उनका आशीर्वाद ग्रहण किया।
 
तात्पर्य
 हमें यह ध्यान देना चाहिए कि इस जगत को छोडऩे के समय भी ध्रुव महाराज अपनी भक्ति के प्रति कितने निष्ठावान थे। वे भक्ति के कार्यों करने में निरन्तर सतर्क रहते थे। प्रत्येक भक्त को प्रात:काल स्नान करके शरीर में तिलक धारण करना चाहिए। कलियुग में स्वर्ण या रत्नाभूषण प्राप्त कर सकना कठिन है, किन्तु शरीर भर में बारह तिलक चिह्न लगा लिए जाँय तो शरीर को पवित्र करने के लिए यह शुभ अलंकरण पर्याप्त होगा। चूँकि ध्रुव महाराज उस समय बदरिकाश्रम में रह रहे थे, अत: वहाँ पर अनेक साधु भी थे। जब विमान आया तो ध्रुव महाराज गर्वित नहीं हुए, वरन् विनीत वैष्णव की भाँति मुनियों का आशीर्वाद प्राप्त करके ही विमान पर आरूढ़ हुए।
 
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