श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 12: ध्रुव महाराज का भगवान् के पास जाना  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक  4.12.37 
शान्ता: समद‍ृश: शुद्धा: सर्वभूतानुरञ्जना: ।
यान्त्यञ्जसाच्युतपदमच्युतप्रियबान्धवा: ॥ ३७ ॥
 
शब्दार्थ
शान्ता:—शान्त; सम-दृश:—समदर्शी; शुद्धा:—पवित्र; सर्व—समस्त; भूत—जीवात्माएँ; अनुरञ्जना:—प्रसन्न करनेवाले; यान्ति—जाते हैं; अञ्जसा—सरलतापूर्वक; अच्युत—भगवान् के; पदम्—धाम को; अच्युत-प्रिय—भगवान् के भक्त; बान्धवा:—मित्र ।.
 
अनुवाद
 
 जो शान्त, समदर्शी तथा पवित्र हैं तथा जो अन्य सभी जीवात्माओं को प्रसन्न करने की कला जानते हैं, वे भगवान् के भक्तों से ही मित्रता रखते हैं। केवल वे ही वापस घर को अर्थात् भगवान् के धाम को सरलता से जाने में सफलता प्राप्त कर सकते हैं।
 
तात्पर्य
 इस श्लोक के वर्णन से पूरा-पूरा संकेत मिलता है कि भगवान् के भक्त ही वैकुण्ठलोक में प्रवेश कर सकते हैं। पहली बात यह कही गई है कि भक्त शान्त होते हैं क्योंकि अपनी इन्द्रियतृप्ति के लिए उनकी कोई माँग नहीं होती। वे तो भगवान् की सेवा में समर्पित रहते हैं। कर्मी कभी भी शान्त नहीं रह सकते क्योंकि इन्द्रियतृप्ति के लिए उनकी बड़ी-बड़ी माँगें होती हैं। ज्ञानी भी शान्त नहीं हो सकते क्योंकि मुक्ति प्राप्त करने अथवा परब्रह्म से तदाकार होने के प्रयासों में वे अत्यधिक व्यस्त रहते हैं। इसी प्रकार से योगी योगशक्ति प्राप्त करने के लिए अशान्त बने रहते हैं। किन्तु भक्त शान्त रहता है, क्योंकि वह भगवान् पर पूर्णत: समर्पित होता है और अपने को नितान्त असहाय समझता है। जिस प्रकार शिशु अपने माता-पिता पर आश्रित रहकर परम शान्ति पाता है, उसी प्रकार भक्त भी भगवान् की कृपा पर आश्रित रहने के कारण पूरी तरह से शान्त रहता है।

भक्त समदर्शी होता है। वह सबों को एक ही दिव्य पद पर देखता है। वह जानता है कि यद्यपि अपने पूर्वकर्मों के अनुसार ही बद्धजीव विशेष शरीर धारण करता है, किन्तु वस्तुत: हर जीव परमेश्वर का अंश होता है। भक्त सभी जीवात्माओं को आत्म-दृष्टि से देखता है और देहात्म बुद्धि-स्तर पर जीव-जीव में भेद नहीं मानता। ऐसे गुण भक्तों की संगति से ही उत्पन्न होते हैं। भक्तों की संगति के बिना मनुष्य कृष्णचेतना में प्रगति नहीं कर सकता। इसलिए हमने अन्तर्राष्ट्रीय कृष्णभावनामृत संघ स्थापित किया है। वास्तव में जो भी इस संघ में रहता है उसमें स्वत: कृष्णचेतना उत्पन्न हो जाती है। भक्त भगवान् को प्रिय होते हैं और भगवान् भक्त को। केवल इस स्तर पर मनुष्य कृष्णचेतना में प्रगति कर सकता है। कृष्णभावनाभावित व्यक्ति पुरुष अथवा भगवान् के भक्त ही हर किसी को प्रसन्न रख सकते हैं, जैसाकि कृष्णभावनामृत आन्दोलन से परिलक्षित होता है। हम बिना भेद के सबको आमंत्रित करते हैं; हम सबसे बैठने और हरे कृष्ण मंत्र का जप करने को कहते हैं और हम जितना भी प्रसाद दे सकते हैं, लेने को कहते हैं। इस प्रकार सभी हमसे प्रसन्न रहते हैं। यही विशेषता है। सर्वभूतानुरञ्जना:। जहाँ तक शुद्धता का प्रश्न है भक्तों से अधिक शुद्ध कोई हो नहीं सकता। जो भी विष्णु का नाम एक बार भी लेता है, तुरन्त भीतर-बाहर से शुद्ध हो जाता है (य: स्मरेत्पुण्डरीकाक्षम्)। चूँकि भक्त निरन्तर हरे कृष्ण मंत्र जपता रहता है, अत: भौतिक-जगत के कल्मष उसके पास नहीं फटकते। इस प्रकार वह वास्तव में शुद्ध हो जाता है। मुचि हय शुचि हय यदि कृष्ण भजे। कहा जाता है कि यदि चमार अथवा चभार कुल में उत्पन्न व्यक्ति भी कृष्णभक्ति करे तो ब्राह्मणपद (शुचि) प्राप्त कर सकता है। ऐसा व्यक्ति, जो शुद्ध कृष्णभक्त है और हरे कृष्ण मंत्र का जप करता है, सारे विश्व में सर्वाधिक शुद्ध होता है।

 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥