श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 13: ध्रुव महाराज के वंशजों का वर्णन  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक  4.13.34 
तांस्तान् कामान् हरिर्दद्याद्यान् यान् कामयते जन: ।
आराधितो यथैवैष तथा पुंसां फलोदय: ॥ ३४ ॥
 
शब्दार्थ
तान् तान्—वही वही; कामान्—इच्छित वस्तुएँ; हरि:—भगवान्; दद्यात्—देंगे; यान् यान्—जो जो; कामयते—इच्छा करता; जन:—व्यक्ति; आराधित:—पूजित होकर; यथा—जिस तरह; एव—निश्चय ही; एष:—भगवान्; तथा—उसी प्रकार; पुंसाम्— मनुष्यों का; फल-उदय:—फल ।.
 
अनुवाद
 
 यज्ञों का कर्ता (कर्मकाण्ड के अन्तर्गत) जिस कामना से भगवान् की पूजा करता है, वह कामना पूरी होती है।
 
तात्पर्य
 भगवद्गीता में भगवान् कहते हैं कि वे पूजा करनेवाले को उसकी इच्छाके अनुसार आशीर्वाद देते हैं। भगवान् समस्त बद्धजीवों को इस संसार में अपने-अपने ढंग से कर्म करने की छूट देते हैं। किन्तु वे अपने भक्तों से कहते हैं कि उस प्रकार कर्म न करके उनके लिए श्रेयस्कर होगा कि वे उनकी शरण में आएँ, क्योंकि वे भक्तों का भार स्वयं उठाएँगे। एक भक्त तथा सकाम कर्मी के बीच यही अन्तर है। सकाम-कर्मी मात्र अपने कर्मों का फल भोगता है, किन्तु भक्त भगवान् के निर्देशन में भक्तिमार्ग पर अग्रसर होता हुआ जीवन का परम लक्ष्य—अपने घर अर्थात् भगवान् के परम धाम जाना—प्राप्त करता है। इस श्लोक में महत्त्वपूर्ण शब्द कामान् है, जिसका अर्थ है, “इन्द्रिय को तृप्त करनेवाली इच्छाएँ।” भक्त समस्त कामों से रहित होता है। वह तो अन्याभिलाषिता-शून्य होता है अर्थात् भक्त तो इन्द्रियतृप्ति की समस्त अभिलाषाओं से रहित होता है। इसका एकमात्र लक्ष्य भगवान् की इन्द्रियों को तुष्ट करना होता है। एक कर्मी तथा भक्त में यही अन्तर है।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥