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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 13: ध्रुव महाराज के वंशजों का वर्णन  »  श्लोक 40
 
 
श्लोक  4.13.40 
स शरासनमुद्यम्य मृगयुर्वनगोचर: ।
हन्त्यसाधुर्मृगान् दीनान् वेनोऽसावित्यरौज्जन: ॥ ४० ॥
 
शब्दार्थ
स:—वह, वेन नामक बालक; शरासनम्—अपना धनुष; उद्यम्य—लेकर; मृगयु:—शिकारी; वन-गोचर:—जंगल में जाकर; हन्ति—मारता था; असाधु:—अत्यन्त क्रूर होकर; मृगान्—मृगों को; दीनान्—दीन; वेन:—वेन; असौ—वह रहा, वह आया; इति—इस प्रकार; अरौत्—चिल्लाते; जन:—सभी लोग ।.
 
अनुवाद
 
 वह दुष्ट बालक धनुष-बाण चढ़ाकर जंगल में जाता और वृथा ही निर्दोष (दीन) हिरनों को मार डालता। ज्योंही वह आता कि सभी लोग चिल्ला उठते, “वह आया क्रूर वेन! वह आया क्रूर वेन!”
 
तात्पर्य
 क्षत्रियों को जंगल में शिकार करने की छूट है, इसलिए कि वे वध करना सीखें, इसलिए नहीं कि खाने या अन्य कार्य के लिए पशुओं का वध करें। क्षत्रिय राजाओं को कभी-कभी अपने राज्य के अपराधी की गर्दन काट लेनी होती थी इसलिए क्षत्रियों को जंगल में शिकार खेलने की अनुमति थी। चूँकि अंग का पुत्र वेन बुरी माता से उत्पन्न था, अत: वह अत्यन्त क्रूर था। वह जंगल जाकर वृथा ही पशुओं को मारता रहता। उसकी उपस्थिति से पड़ोस के निवासी भयभीत रहते और उसे देख कर पुकार उठते, “वेन आया, वेन आया!” इस प्रकार वह अपने जीवन के प्रारम्भ से प्रजा के लिए भयावह था।
 
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